आमिर खान साहब “कुर्बानी की सार्थकता” समझिये…

कई दिनों से देश की भिन्न मीडिया में बकरे की कुर्बानी का ज़िक्र हो रहा है, जिसकी सार्थकता पर बार बार सवाल उठ रहे हैं. अत: इसकी सार्थकता हेतु ३ मुख्य बिन्दुओं पर मैं ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ .

१ -: बायोकेमिस्ट्री का मानना है कि हमारे शरीर में २० प्रकार के अमीनो एसिड होते हैं १० को नॉन इसेन्शियल कहा जाता है , जिन्हें शरीर स्वयं बनाता है बाकी बचीं १० अमीनो एसिड जिन्हें इसेन्शियल अमीनो एसिड जिसे शरीर नहीं बना सकता.
इसेन्शियल अमीनो एसिड की पूर्ति सिर्फ डाइट से होती है और वह डाइट सिर्फ रेड मीट यानी मटन है.

२ -: वेद के विद्वानों के अनुसार एक दौर में प्रलयकारी बीमारी से लोगों की जान जाने लगी ये देख राजा ने अपने संत , ऋषि ,वेैद्य से परामर्श कर बीमारी का उपचार जानना चाहा. तब उन महान हस्तियों ने बताया कि शरीर में एक खास तत्व की कमी है जिसे सिर्फ लाल मांस यानी मटन से ही दूर किया जासकता है.

३-: इस्लाम धर्म के अनुसार कुर्बानी साल में एक बार कीजिये कुर्बानी किये मांस को तीन हिस्से में बांटिये. पहला हिस्सा गरीब तबका को दीजिये जो कर्बानी नहीं करसकते. दूसरा हिस्सा रिश्तेदार जो कुर्बानी नहीं करसके उन्हें दीजिये. तीसरा हिस्सा घर पर खुद खाइये और मेहमान को खिलाइये.
अब बात तीनो बिन्दुओं के का मिलान कर एक परिणाम पर जाने की …….वेद जिसे हमारे पूर्वजों ने दिया जो जीवन जीने का तरीका बताता है. वेद के अनुसार साल में एकबार बली देकर लोगों को बकरे का मांस खिलाया जाये , तो वहीं वेद के काफी बाद में बखरीद की संकल्पना आई जिसका छिोा उद्देश्य ज़रूर ये रहा होगा कि हर किसी को बकरे का मांस उपलब्ध होसके यानी अमीर से लेकर गरीब तक. जबकि बायोकेमिस्ट्री जो सिध्द करती है कि इसेन्शियल अमीनो एसिड की पूर्ति रेड प्रोटीन यानी रेड मीट से ही पूरी की जासकती है. अत: हम आप कौन होते हैं पूर्वजों की बताई राह को नकारने वाले. प्राचीन काल में ऋिषि द्वारा धार्मिक आस्था को सहारा बना कर जीवन से जुड़े पहलू को वास्तविकता से कदम ताल कराई जाती थी.
अब बात अमिर साहब आपकी जिन्होंने बहुत ही अच्छी बात कही कि गरीबों की मदद कीजिये. लेकिन, अमिर साहब असल में बखरईद का मकसद ही है सभी को मटन नसीब कराया जाये या इसेन्शियल अमीनो एसिड उपलब्ध कराई जाये जो वर्ष में कम से कम एक बार हो. रही बात इस्लाम की तो याहां फितरा और ज़कात जमा कर गरीबों की मदद करना ही अहम मकसद है. इस के अलावा कोई अौर मदद करे तो उसे सदकाये जारिया कहा जाता है जिसे इस्लाम किसी भी त्रासदी पर इंसानियत के लिये हर हाल में करने हेतु प्रेरित करता है. अत: आप ने बखरीद पर एक नये विवाद को जन्म दे दिया.
आप के कहे गये शब्दों ” हज़ारों रुपये के जानवर काटने से बेहतर है कि उस पैसे से गरीबों को खाना खिला दिया जाये ” के जवाब में ये कहना चाहूंगा कि कुर्बानी का गोश्त गरीबों में तक्सीम होता है , जो साल में एक बार गरीबों को नसीब होता है जबकि आप जैसे शुभचिन्तक जब चाहें तब खायें.
आपकी फिल्मों के टिकट की कीमत सिर्फ आप के पाकेट भरती है, वह अलग बात है कि अाप कभी कभी देशभक्त बन कुछ डोनेट कर देते हैं , तो क्यों न आप की फिल्मों के टिकट पर होने वाले खर्च से फिल्म न देख, उससे गरीबों को खाना खिलाया जाये. आमिर साहब समझ सकते हैं आपका दर्द …… राजनीति ने आप की फिल्मों का शिकार किया है . अाप उस से उबरने के लिये उस राजनीति का इस्तेमाल मत कीजिये वर्ना दीवार के तो कान होते ही हैं साथ ही उनकी ज़ुबान भी होती है जो अगर चल गई तो समझ लीजिये इस देश के सुकून शिकार होजायेगा. बाकी आप समझदार हैं

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