आरक्षण राष्ट्रीयता के लिए कितना विष कितना अमृत ?????

आरक्षण राष्ट्रीयता के लिए कितना विष कितना अमृत ?????
जाति आधारित संकल्पना आखिर अस्तित्व में क्यों आई ? क्या जाति आधारित संकल्पना का परिणाम आरक्षण है ? आरक्षण सर्वधर्म सदभाव वाले देश अर्थात भारत में किस हद तक सार्थक सिद्ध हुआ है ? आखिर आरक्षण से देश के भविष्य का होगा क्या ? कहीं ऐसा तो नहीं आरक्षण के तंत्र में देश का भविष्य बंधक बनता जा रहा है ? जिन दरिद्रों के लिए आरक्षण की संकल्पना अस्तित्व में आई, क्या इसकी सार्थकता उनके विकास हेतु भूत एवं वर्तमान को सार्थक बना इन विकासहीन भारतियों के उज्ज्वल भविष्य की नीव रख पाई ???

आज का युवा, वह चाहे किसी भी जाति, धर्म, समुदाय , सोसाइटी से संबंधित हो उपरोक्त प्रश्नों से यदा कदा वह दो चार हो रहा है. उनका दर्द भी जाएज़ है. जब किसी आरक्षित वर्ग के युवा का चयन IIT ,NIT , AIMS आदि संस्थानों में होता दिखाई देता है. उसकी क़ाबलियत पर शक ज़रूर किया जाता है. क्या इसका कारण आरक्षण है ???

जब किसी सामान्य वर्ग के के युवा का चयन मात्र कुछ नम्बरों या रैंकिंग के कारण नहीं हो पता, वह भी तब जब उसकी क़ाबलियत पर कोई शक न हो, इस जनरल वर्ग के छात्र का चयन न होने का कारण क्या आरक्षण है ???

देश में आरक्षण की संकल्पना की पृष्ठभूमि कहीं न कहीं १५०० बी सी में रची गई , जब जाति पद्धति चार श्रेणियों ब्रह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र में बंटी. खास बात ये रही की ब्रह्मण को सुप्रीम तो वहीँ शूद्र को अछूत के रूप पहचान मिली. लेकिन इस पद्धति का आज के युवाओं से जोड़ कर देखना शायद सबसे बड़ा अधर्म होगा. लेकिन इस अधर्म को देश पर राज करने वाले फिरंगियों ने अपने स्वार्थपूर्ण धर्म को निभाने हेतु एक ऐसा बीज सर्वधर्म सदभाव की मिटटी में बोया , जिसकी फसल न चाह कर भी आज तक काटी जा रही है. क्या इसका कारण आरक्षण है ?

१९५० में संविधान पारित होते ही भारत देश को सामाजिक राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया गया , जो सराहनीय पहल थी. लेकिन, इस राष्ट्र को खंडित होने में देर नहीं हुई जब इसके अपनों ने डोमेसाइल आरक्षण का बीज बोया. परिणाम स्वरुप , महाराष्ट्र को सिर्फ मराठी, तो वहीँ दक्षिण को सिर्फ तमिल, तेलगु, कन्नड़ आदि ही अपने प्रतीत होते हैं. दूसरी तरफ उत्तर भारतीयों को उत्तर पूर्व से लेकर दक्षिण तक एवं पश्चिम से लेकर दक्षिण तक सिर्फ ज़हर से भरे दोहरे मापदंड से रु बरु होना पड़ता है, क्या इसका कारण आरक्षण है ?
३ से ५ % का आरक्षण प्राप्त करने वाले विकलांग श्रेणी के लोग आज उच्च शिक्षा से लेकर सरकारी नौकरियों में अपनी मौजूदगी बढ़ा आरक्षण की सार्थकता सिद्ध करते हैं कर रहे हैं. लेकिन , विकलांगों को अभी तक समाज में बराबरी का अहसास नहीं मिला , क्या इसका कारण आरक्षण है ?

पाकिस्तान और बंगला देश के विभाजन पश्चात , हमारे देश की एकता को बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक की श्रेणी में खंडित किया गया , सच्चर कमेटी की रिपोर्टों के अनुसार अल्पसंख्यकों का वर्ग मुस्लिम समाज जो आर्थिक , शैक्षिणिक रूप से पिछड़ेपन का भेदभाव झेल रहा है. क्या इसका कारण आरक्षण है ? क्या मुस्लिमों के पिछड़ेपन से ये सिद्ध होता है कि बहुसंख्यक अल्पसंख्यकों की तुलना में अधिक खुशहाल , विकसशील होकर जीवन का आनंद उठा रहे हैं , उनका आने वाला भविष्य अल्पसंख्यकों की तुलना में अधिक उज्जवल है ? नहीं, बिलकुल नहीं. क्या इस असमानता का कारण आरक्षण है ?

१९६० में देश ने फिर एक और वर्ग को आरक्षण के हवाले होते देखा , जी हाँ बात उस औरत की हो रही है, जो में माँ, बहन , बेटी या पत्नीके रूप में ज़िन्दगी का सबसे ज़्यादह कठिन पहलू है, महिलाओं को समाज में बेहतर मुकाम देने हेतु उनके लिए उच्च शिक्षा संस्थानों का अलग किया जाना , उनके लिए अलग से सार्वजनिक सुविधाओं जैसे ट्रैन या बस में आरक्षित सीटों का प्रावधान अस्तित्व में लाना, क्या इतने से ही महिलाओं की सामाजिक हैसियत बढ़ गई जिसकी महिलाऐं हक़दार हैं ??? समाज में महिला एवं पुरुष के क़द में लगातार असमानताएं बढ़ती जा रही है . क्या इस असमानता का कारण आरक्षण है ?

देश के इतिहास में सबसे दर्दनाक स्थिति अगर किसी की रही होगी तो वह दलित एवं महांदलित हैं. १९८२ में सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र और सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं में १५% एवं ७.५ %, कुल २२.५ % का आरक्षण मात्र ५ वर्षों के लिए लागु कर sc st वर्ग के हालात बदलने की कोशिश की. निर्धारित ५ वर्षों में दलित वर्ग को कितना लाभ हुआ , इस बात पर किसी का ध्यान नहीं था . चुनाव होते रहे, केंद्र एवं राज्यों में सरकारें गठित होती रहीं, देखते देखते १९९० का ऐतिहासिक दौर आया . ५ वर्षों बाद होने वाली आरक्षण कोटा की समीक्षा होनी थी . लेकिन, समीक्षा के स्थान पर वोट बैंक राजनीती हेतु देश की राजनितिक पार्टियां इस आरक्षण को नया आयाम देने में लग गईं, और दलित वोट हइब्रीड सेकुलरिज़्म उपज सोशल इंजीनियरिंग\ की बंधक बन गईं. परिणाम स्वरुप दलितों के हालात उस उम्मीद के मुताबिक नहीं बदले जितना की देश ने सोचा होगा, क्या इसका कारण आरक्षण है ?

आरक्षण का काफिला यहीं नहीं थमा, १९९० के दशक में मंडल आयोग की बारह वर्षीय अध्यन पर आधारित सिफारिशों को ध्यान में रख कर भारत के प्रधान मंत्री वि पि सिंह ने सरकारी नौकरियों में भी आरक्षण लागु कर दिया, जनतादल की सरकार गिरी, खामयाज़ा भुगता प्रधान मंत्री ने. इस प्रकार देश के हालात वोटों के दलदल में फंसते जारहे थे. sc , st के २२.५% आरक्षण में २७ % का obc आरक्षण शामिल कर सरकार ने आरक्षण कुल ४९.५ % पर ल खड़ा किया , गवाह बना वर्ष २००६. इन्तहा तो तब होगई जब आरक्षणकी नीति ने ने टूशन फीस एवं कुल अंकों में ५ से १०% की छूट तो वहीँ ३ से ५ वर्ष की आयु सीमा में छूट देकर sc एवं st को खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मान लीजिए मेरे एक sc मित्र जो सरकारी कर्मचारी हैं , उनका मासिक वेतन ५०००० रूपये है, उनका बेटा sc कोटा से सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश लेता है, साथ ही उसे सरकार से सालाना छात्रवृत्ति मिलती है. इस छात्र की तुलना उन गरीब बेसहारा दलित छात्रों से की जाए तो सोचिये मेरे sc मित्र के बेटे को मिलने वाली सुविधा कितनी जाएज़ है ??? आज की परिस्थिति में ऐसा प्रतीत होता है कि विकासशील दलित स्वयं असहाय दलितों का हक़ छिनता दिखाई दे रहा है. क्या इसका कारण आरक्षण है ?

२०१० में महिलाओं को पुरुष की बराबरी पर लाने के लिए ग्राम पंचायत, म्युन्सिपल चुनाओ आदि में ३०% का आरक्षण मिला. संतोषजनक लाभ महिलाओं को मिला नहीं, लाभान्वित तो राजनितिक दल हुए, क्या इसका कारण आरक्षण है ?

६५ वर्षी भारतीय संविधान ने ढेरो सरकारें देखीं, लेकिन इन सरकारों के पास आरक्षण पर कोई ठोस एवं स्थाई नीति बनीं नहीं , अतः राजनितिक दलों की नीति में “आरक्षण दिए जा और वोटों को आरक्षित किये जा ” कि संकल्पना ही दिखाई देती रही.क्या इसका कारण आरक्षण है ?

क्या अच्छा होता कि देश में कई दर्जन स्कूली बोर्ड कि जगह एक ही शिक्षा बोर्ड होता, तब स्कूलों का स्तर एक सामान होता, देश में शिक्षा फ्री होती तो शायद आरक्षण कि ज़रूरत न पड़ती, तब तो बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक का भिन्न वर्ग न होता, sc ,
st , obc आदि वर्गों की जगह एकल वर्ग हिंदुस्तानी वर्ग होता, ………………………………………………………………….लिखते, लिखते मैं भी कल्पना में चला गया ………………. ……………………… , क्या इसका भी कारण आरक्षण है ???