आरक्षण हेतु आंदोलन, आंदोलन के लिए बलवा, उचित नहीं, निरर्थक ज़रूर !

                  निर्वाचित सरकार और नेताओं के राज – धर्म की ये कैसी प्रवृत्ति जो हरियाणा की जनता ने झेला है ? क्या राज्य की कार्यपालिका और पुलिस-प्रशासन ने राज्य की दशा हेतु सही दिशा में फ़र्ज़ को अंजाम दिया है ? क्या हालात पर क़ाबू पाने के लिए सेना बुलाने का ढोंग हुआ ? यदि नहीं तो क्या अब देश की सेना भी ऐसी हो चुकी है कि वो दंगाईयों से अपने नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा को सुनिश्चित नहीं कर सकती ? क्या यही है ‘सबका साथ सबका विकास’ की प्रवृत्ति है ? क्योंकि हरियाणा के ताज़ा घटनाक्रम से ये सवाल उपजा है कि क्या जनादेश का मतलब सिर्फ़ ‘पंचवर्षीय अमरत्व’ है ? क्या एक बार जनादेश पाने के बाद ये सरकार पर है कि वो अपनी ज़िम्मेदारी को चाहे जैसे निभाये, कोई उससे सवाल नहीं करेगा ? कौन बचा? किसे बख़्शा गया? कितने हज़ार वाहन और दुकानें फूंक डाली गयीं?ऐसा नुक़सान तो किसी हमले में भी शायद ही होता हो. अभी तक इसका न तो कोई अंदाज़ा है और न ही आंकड़ा. तो क्या ये आन्दोलन नहीं, हमला है या फिर विशुद्ध रूप से सुनियोजित दंगा है ? जिस ढंग से ये शरू हुआ, अनचाही इस आग को हवा किसने दी ? 1984 के सिख विरोधी दंगों सी सूरत को किसने सीरत दी, की हरियाणा की सरकार अभी तक तो उन लोगों के गिरेबान में भी हाथ न डाल सकी, जिन्होंने इसे भड़काया, अतः प्रश्न उठता है कि सर्वशक्तिमान सरकार को इतना कमज़ोर और अदूरदर्शी होना चाहिए ?

हरियाणा का बीते दस दिनों में पूरे राज्य के दर्जनों प्रमुख शहरों में एक साथ और इतने दिनों तक हुई निरंकुश हिंसा क्या महज़ एक आन्दोलन है? देश ने पहले स्थानीय से लेकर क्षेत्रीय और देशव्यापी जैसे बहुत से आन्दोलन देखे हैं. प्रश्न उठता है कि क्या इतनी व्यापक हिंसा वो भी इतने दिनों तक पहले कभी अंजाम हुई ? . आन्दोलन के नाम पर स्कूल जलाये गये, अस्पताल फूंक डाले गये, मॉल को ख़ाक कर दिया गया, मार्केट और दुकानें लूटी गयीं, घरों में घुसकर लूटपाट, आगजनी और हत्याएं की गयीं. मंत्रियों के घरों पर हमले हुए.
क्या विरोधियों की राजनीति ने खट्टर सरकार को बदनाम और अस्थिर करने के लिए ऐसा दंगा करवाया है ? अगर ऐसा है तो किसी भी क़ीमत पर उन्हें भी जेलों में ठूंसिए और उन्हें मनमानी करने से रोकिए. खोखले आश्वासन और ख़ाली बयानबाज़ी की जुगलबंदी की रस्म अदायगी करने से काम चलेगा नहीं. इधर सरकार सिर्फ शांती की अपील करती रही उधर आंदोलन ने हिंसा तो हिंसा ने बलवा का राक्षसीय रूप धर लिया. अतः ये कैसी सरकार है जिसे लगता है कि शान्ति की अपील करने से ही शान्ति क़ायम हो जाएगी ? या, इसकी नीति ये है कि जब दंगाई थक जाएंगे तब अपने आप शान्ति बहाल हो जाएगी. अगर जनता को भगवान भरोसे ही रहना है तो क्या सब कुछ क़िस्मत से ही तय होना है ?
लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी छिनी , हज़ारों व्यापारियों की ज़िन्दगी भर की कमाई को चुटकी बजाकर स्वाहा कर दिया, दर्जनों मौतें हुईं. सैकड़ों लोग अस्तपाल में जूझ रहे हैं, क्या देशभक्ति का तकाज़ा यही है कि एक जाति का चेहरा दूसरी जाति के चहरे को इस तरह सरेआम तबाह कर दे ? अभी तक ये देश हिन्दू-मुसलिम दंगे झेला करता था. लेकिन हरियाणा में तो हिन्दू ही हिन्दूओं को तबाह किया. क्योंकि जाटों की नज़र में औरों का पिछड़ापन किरकिरी बन गया. इसीलिए उन्हें भी पिछड़ापन चाहिए. हर क़ीमत पर चाहिए. फ़ौरन चाहिए. पूरा चाहिए. चाहे जहां से आये, लेकिन चाहिए तो चाहिए.तो क्या आरक्षण मिलने में देर होगी तो वो ऐसे ही रेल पटरियां उखाड़ेंगे, रेलवे स्टेशनों को फूंक देंगे ? इस बार सिर्फ़ लूटपाट, आगजनी और हत्याएं हुई हैं, यही हाल रहा तो क्या गारंटी है कि इन हालातों से मां-बहनों की आबरू महफूज़ रहेगी. इस दौर के कुसूरवार १९८४ के कुसूरवार से काम काले नहीं हैं. प्रश्न ये उठता है कि ‘नैतिकता’ तभी जागती है, जब ये विपक्ष में होते हैं, इन्हें विपक्षी संस्कृति की बेजोड़ समझ है. ये सत्ता की ज़िम्मेदारियों को निभाने में कमज़ोर रहे हैं. सत्ता के अनुभवों की कमी से इनका विवेकहरण हो चुका है.
निर्लज्जता से भरी राजनीति की ये कैसी मिसाल है कि दूर अरुणाचल में तो सियासत दिखती है, पश्चिम बंगाल में मालदा की ज़ुल्म-ज़्यादती दिखती है, जेएनयू के ‘राष्ट्रद्रोही वामपन्थी’ तो दिखते हैं, जम्मू-कश्मीर में ‘अलगाववादियों की ख़ैरख़्वाह’ पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने की बेचैनी तो दिखती है, धू-धू कर जल रहा हरियाणा का अपना घर नहीं दिखता, लेकिन पटियाला हाउस कोर्ट में उपद्रवी वकीलों की बर्बरता इन्हें नहीं दिखती,तो उधर रोहित वेमुला की आत्महत्या पर ब्लड प्रेशर कैसे काबू में रहता है.

सियासी रोटियां सेंकने वाले अब अपने घड़ियाली आंसुओं का पिटारा लेकर हरियाणा में मरहम लगाने की ढोंगी मुहिम चलाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नुक़सान का हर्ज़ाना दंगाईयों से वसूलना चाहिए, अतः प्रश्न उठता है कि ऐसा क्या पहले कभी हुआ है जो अब हो जाएगा. अब भी सरकार अपने चहेतों को ही मुआवज़ा देगी. सबके नुक़सान की भरपायी जो शायद ही कभी हो. हमेशा की तरह मुआवज़ों का बोझ भी जनता पर ही पड़ेगा. सरकारी सम्पत्तियों के नुक़सान के बाद ये ‘करेले पर नीम’ चढ़ाने जैसा है.

प्रश्न ये भी उठता है कि काले धन की मांग हेतु, कॉलेज स्कूल की कमी हेतु, शिक्षा के दोहरे तिहरे मापदंड (ICSE , CBDE , स्टेट बोर्ड में बंटी शिक्षा ) हेतु, बेरोज़गारी हेतु ऐसे नजाने कितने मुद्दे हैं जिनके लिए अहिंसक आंदोलन होना चाहिए लेकिन , जनता ऐसे मुद्दों पर मौन क्यों हो जाती है ?