कठिन है डगर विकास की !

क्या देश को देखने का नजरिया अब भी जाति, धर्म या किसान-मज़दूर में बंटा हुआ है ? सियासी बूटी में ऐसा कौन सा गुण है जो राजनीति को रहत तो देता है लेकिन समाज को सुख नहीं दे पाता, क्यों ? दलित आज तक समाज की मुख्य धारा से क्यों महरूम हैं  ? राजनीति साधने हेतु हिंदू राष्ट्र बनाने का सबसे बड़ा शिगूफा छोड़ दिया जाता है, मुस्लिम   इस सोच तले असुरक्षित महसूस करते हैं, तो किसान बढ़ती विकास दर के बीच लगातार खुदकुशी करता जारहा है, अमीर और अमीर होते जारहे हैं तो वहीँ गरीबों की हालत और खस्ता, अतः  साम्प्रदायिकता हो या अर्थनीति दोनों में नागरिकों की ही क़ुरबानी होती आ रही है, तो फिर देश के हर मसले को हिन्दू -मुस्लिम, अमीर – गरीब, जात -पात के बीच क्यों उलझा दिया जाता है ? बहस क्यों नहीं होती कि इस देश के विकास के लिए संविधान कुछ कहता क्यों नहीं ? या फिर संविधान को सत्ता पाने के तौर तरीकों ने बंधक बना लिया है ?
          असल में दलित, किसान और अल्पसंख्यक तीनों ही चुनाव पूर्व वोट बैंक के जितने बड़े श्रोत बन कर उभरते हैं, चुनाव पश्चात वह हाशिये पर आने को मजबूर भी  हो जाते हैं. असल में  आज़ादी पश्चात से आज तक न तो ऐसा कोई बजट बाक़ी है, न ही कोई पंचवर्षीय योजना जिसमें इस तबके को कोई आर्थिक मदद न दी गई हो, और तो और सरकारी पैकेज देते वक़्त इन्हें मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश न हुई हो. लेकिन, इन  तबकों से विकास आज भी कोसों से दूर है. असल में देश की सियासत जिस पहलू से कदम ताल कर बैठी है उसके प्रभाव पर नज़र डालें, तो बीते तीन बरस में दलित उत्पीड़न के मामले ५०% बढ़े हैं. प्राप्त जानकारी के अनुसार हर दो घंटे में एक किसान खुदकुशी करता है, जो किसानों की खुदकुशी में आई तेज़ी की ओर संकेत देता है. जहाँ एक तरफ मुस्लिमों की मौजूदगी संसद में कम होती जा रही है, तो वहीँ उनकी बढ़ती अशिक्षा भी उनके और समाज की मुख्य दौर के बीच बढ़ रहे गैप को ही परिभषित करते हैं.
            किसानों पर किये गए शोध के अनुसार साढ़े चार हज़ार किसानों ने खुद को इस लिए मौत के हवाले कर लिया कि खेती के लिए जो क़र्ज़ उन्होंने लिया था उसे लौटने की धमकी सहन न कर सकने की पीड़ा ने उन्हें जीने नहीं दिया. करीब १२०० किसानों ने ग्रामीण बैंक से क़र्ज़ लिया था यानी उनके बीच सिर्फ सरकार और सरकारी तंत्र था. ये वही तंत्र है जो बैंकों के ज़रिये कॉर्पोरेट और बड़ी कंपनियों को १३ लाख करोड़ क़र्ज़ दे चूका है, जिसे बैंकों को आज तक वापस किया नहीं गया. अतः किसानों के साथ सौतेले व्यवहार का जो चलन बन चूका है, प्रश्न तो उठेगा कि आखिर सरकार औद्योगिक सेकटर को हर बरस भिन्न भिन्न टैक्स हेतु ३ लाख करोड़ की माफी हो जाती है लेकिन कृषि हेतु सरकार २ लाख करोड़ की सब्सिडी देने को तैयार नहीं होती है.
            अगर दलित और अल्पसंख्यक के सामाजिक हालत का अध्यन करियेगा तो आप को हैरत होगी कि जहाँ सांप्रदायिक हिंसा के कारण ७०% मौत इसी तबके की हुई, तो वहीँ दरिद्रता की वजह से होती मौतों में इनकी तादाद ९०% के पर है. अतः जिनकी जेब में जीने के सामान खरीदने की ताकत है, जिनके पास पढ़ने के लिए पूंजी है, जिनके पास इलाज हेतु हेल्थ कार्ड है ऐसे १५ से २०% लोग ही असल हिन्दुस्तानी हैं क्या ?
             अगर सत्ता पाने और सत्ता में बने रहना ही गवर्नेंस है तो फिर केंद्र हो या राज्य हर स्तर की सरकार एक सरीखी दिखती हैं, देश के ६७६ ज़िलों में 302 ज़िलों को सूखे की तपिश ने अपनी गिरफ्त में ले रखा है, जिसका अहसास सरकारों में दीखता नहीं, शायद इसी लिए मनरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसे कार्यक्रमों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भी इस की तरफदारी में सवाल पूछ लिए. गौर करने की ज़रूरत है की जब २०१३-१४ में जो  कृषि विकास दर ३.७% थी वह अब १.१% पर आ पहुँची है. जो किसानों के पलायन की मुख्य वजह होने की गवाही देता है.
            हद तो ये है कि किसान, दलित और अल्पसंखयकों को समाज की मुख्य धरा से जोड़ने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर बीते ६८ सालोँ में २४५० से अधिक योजनाएं बनाई गयीं, १०००० से अधिक कार्यक्रम का ऐलान किया गया, लेकिन इन तबकों की पहचान आज भी मुख्य धरा के रूप में नहीं बन सकी, शायद इसी लिए ये तबके दलित, किसान और अल्पसंख्यक तक ही सीमित हैं, जिसे सत्ता पाने वालों ने आज तक बरक़रार रखा.