कौन जीतेगा बिहार… २८% की अतिपिछड़ी, महापिछड़ी वोटों में सेंध लगाने वाले या इन वोटों को साधने वाले ???

इसमें कोई शक नहीं कि भारत के लोकतंत्र के अब तक के ऐतिहासिक क्लाइमेक्स कि पुनरावृत्ति ही झलकती है बिहार विधान सभा चुनाव में, अर्थात विकास पर भारी पड़ती जाति की राजनीती . बिहार की इन वोटों को लुभाने के लिए जहाँ नितीश ने कुछ जातियों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की सिफाऱिश केन्द्र को भेजा तो वहीँ भाजपा ने भी संघ परिवार के सहारे इस वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश की है. ऐसे में बिहार चुनाव दिलचस्प मोड़ पर है.

लोकसभा चुनाव की तर्ज पर विधानसभा चुनावों में भी मोदी के ओबीसी कार्ड को जम कर भुनाने में लगी भाजपा 25 फीसद वाले ब्रहाम्ण , भूमिहार , राजपूत और कायस्थ समाज एवं वैश्य समाज वाली अग्रणी वोटों पर नज़र जमाए हुए है. तो वहीँ आरा बक्सर की ये वोट क़रीब करीब भाजपा के साथ जाती दिखाई दे रही है. इनका मन्ना है की भाजपा को एक मौका मिलना चहिए . यही नहीं यहाँ के युवा नितीश से काफी हद तक मुतास्सिर हैं , लेकिन नितीश को लालू का साथ इन युवाओं को खटकता है. खास बात ये है कि ये वह युवा हैं जो जंगल राज से खौफ खा रहे हैं इसे इन्हों ने देखा भी नहीं . लेकिन अपने बड़े बुज़ुर्गों से सुने क़िस्सों ने इन्हें भाजपा के साथ कर दिया.

छपरा कि बात हो तो समझ लीजिए कि लालू के गढ़ कि बात होरही है, जिस तरह से लालू दौर को जंगल राज प्रचारित किया जा रहा है यादव वोट का ध्रुवीकरण बढ़ता जाएगा, लाभ नितीश को होना तय दिखाई देता है. पप्पू यादव के गढ़ यानी मधेपुरा का हाल लालू के वोटों के इर्द गिर्द है, लाभ नितीश को होगा. पूर्णिया , किशनगंज , अररिया और कटिहार के मुस्लिम वोटर नितीश के विकास एवं महागठबंधन कि धर्मनिरपेक्ष छवि से मुतास्सिर नितीश के साथ खड़े दिखाई देते हैं.

एमआईएम के ओवैसी को आम मुस्लिम मतदाता गंभीरता से किस हदतक लेगा कहना जल्दबाज़ी होगी, लेकिन, पुर्णियां के मुस्लमान कहते हैं कि ओवैसी पहले अपने इलाके में जाकर वहां का विकास करें उसके बाद ही सीमाचंल आने की सोचें . लेकिन ओवैसी के भड़काउ भाषणों से गैर मुस्लिम वोटों का भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण हुआ तो महागठबंधन को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

दूसरी तरफ ओबीसी वोटों को नियंत्रण में करने के लिए कुशवाहा जी को ज़िम्मेदारी दे भाजपा अपनी बिसात बिछा चूका है.
अब रामबिलास पासवान अगर दलितों को और मांझी अपनी नाव से महांदलितों को भाजपा के क़रीब पहुँचाने की भूमिका अदा करते हैं तो भाजपा २० दिखाई पड़ती है, लेकिन, चुनाव तारीखों के ऐलान के बाद सार्वजनिक दो सर्वे , एक महानगठबंधन की जीत की बात करता है तो वहीँ दूसरा सर्वे भाजपा को बीस बता रहा है, अब ये साफ़ दिखाई देरहा है कि चुनाव कांटे कि टक्क्र का है . लेकिन जीत किसकी होगी सेंध लगाने वालों कि या वोटों को साधने वालों कि ये तो वक़्त है बताएगा.