क्योंकि रेप अपने आप में ही क्रूरता की सारी हदें पार कर रहा है !

सभ्य समाज से प्रश्न है कि रेप या यौन हिंसा आखिर है क्या ? क्या ये समाज की जननी अर्थात स्त्री पर हावी होने की प्रवृत्ति मात्र है ? या फिर पुरुष का खुद के बड़ा, असरदार होने का अक्षम्य दंभ ? या फिर औरत को संपत्ति समझने की भूल ? आखिर कैसे हमारा कानून औरत को संरक्षण देने की बात कहता है, वः भी तब जब संरक्षण संपत्ति का होता है न कि किसी व्यक्ति का नहीं ? क्या हम औरत को सुरक्षा देने की बात सिर्फ इस लिए कहते हैं कि उसे कमज़ोर बताने पर ही हमारा समाज पुरुष प्रधान बन सकता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि मर्द जितना डराना चाहते हैं, उतना ही खुद भी भीतर से डरे होते हैं ? क्या इसी डर को छिपाने के लिए पौरुष का प्रयोग करते फिरते हैं ?

बीते सप्ताह के जींद और पानीपत के मामलों ने 2012 के निर्भया मामले की अनचाही याद ताज़ा कर दी है. अब तो आदमी के हैवान बनने में कोई कसर बची ही नहीं. जो लिखा और कहा जा रहा है, वह हमारी समझ में बिल्कुल इजाफा नहीं कर रहा. क्योंकि मन में कोई कोहराम नहीं मचता. नन्ही बच्चियों को न्याय दिलाने वाले कानून भी व्यर्थ से लगते हैं. किसी कानून का डर कैसे हो सकता है. क्यों कि पता है उन्हें कि मामला पहले तो अदालत तक पहुंचेगा नहीं, पहुंचेगा तो सुनवाई में लंबा समय लग जाएगा, सुनवाई होगी तो दोष साबित करना बहुत मुश्किल हो जायेगा. कारण भी है कि एनएलएसआईयू के सेंटर फॉर चाइल्ड एंड लॉ की बनाई रिपोर्ट को ही ले लीजिये जिसे पिछले दिनों एनएलएसआईयू ने पॉस्को अदालतों के कामकाज पर आधारित स्टडी के आधार पर बनाया. पॉस्को यानी प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज एक्ट, 2012. इसके तहत अलग अदालतें हैं. इस स्टडी में यह पाया गया कि दिल्ली की छह में से चार अदालतों में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर भी नहीं है जो एक्ट के तहत जरूरी है. जैसे न तो बच्चों के लिए सेपरेट इन्ट्रेन्स हैं, न वेटिंग रूम, न ऑडियो विजुअल फेसिलिटी और न ही एविडेंस रिकॉर्ड करने के लिए अलग से कमरा. इसके अलावा पॉस्को कानून के तहत दोष सिद्ध होने की दर भी बहुत कम है. 2016 में पॉस्को एक्ट के अंतर्गत 4000 से ज्यादा मामले दिल्ली की अदालतों में लंबित पड़े हुए थे.

यूं भी कानून में रेप की परिभाषा बहुत अनोखी है. यह इस पर निर्भर करता है कि मर्द का औरत पर कितना अधिकार है. अगर रेपिस्ट अनजान व्यक्ति है, मतलब औरत या लड़की से उसकी शादी नहीं हुई तो वह ज्यादा बड़ी सजा का पात्र है. उसके साथ लिव इन में रहता है तो कम सजा का. तलाक दे चुका है तो ज्यादा सजा का, तलाक नहीं दिया है और मामला कोर्ट में है तो कम सजा का पात्र है. अगर शादी करके मजे से रह रहा है तो किसी सजा का पात्र नहीं है. मैरिटल रेप तो अपने यहां रेप है ही नहीं. लेकिन कानून बनाने वाले यह भूल जाते हैं कि रेप, तो रेप ही है. शादीशुदा का हो या बिना शादीशुदा का, औरत हो, बूढ़ी या बच्ची…, कितना भी क्रूर हो- क्योंकि रेप अपने आप में ही क्रूरता की सारी हदें पार करता है.

कटु सत्य जो कि अत्यंत दुखद है कि रेप के ज्यादातर मामलों में आरोपी अपना कोई जानने वाला होता है. यानी अनजान से अधिक खतरनाक अपने हो जाते हैं. एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक रेप के 94.6% मामलों में आरोपी पीड़ित का रिश्तेदार या कोई परिचित, पड़ोसी शामिल रहा…, जो बेशक आघात है कि अपना कोई सगा ऐसे मामले में शामिल हो. अक्सर पीड़ित का आरोपी को जानना उसके लिए न्याय हासिल करने में सबसे बड़ी रुकावट बन जाता है, शायद यही बात रेपिस्ट को शय देती है जुर्म करने के लिए. नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर मृणाल सतीश ने अपनी किताब डिस्क्रीशन, डिस्क्रिमिनेशन एंड रूल ऑफ लॉ : रिफॉर्मिंग रेप सेन्टेंसिंग इन इंडिया में 1984 से 2009 के बीच के 800 रेप केसेज पर स्टडी की. उनका कहना है कि जिन मामलों में आरोपी पीड़ित का परिचित होता है, उनमें से ज्यादातर मामलों में सजा हल्की दी जाती है. और तो और यदि रेप पीड़ित महिला शादीशुदा नहीं है और सेक्सुअली एक्टिवहै या उसके शरीर पर चोट के निशान नहीं हैं तो भी सजा हल्की हो जाती है.
यौन शोषण के मामले अंजाम तक नहीं पहुँच पाते हैं इसका उदाहरण 2007 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 13 राज्यों में किया गया सर्वेक्षण है. इस सर्वेक्षण में स्कूली बच्चों से बातचीत की गई. इनमें लगभग 12,500 ने माना कि उनका यौन उत्पीड़न हुआ है. लेकिन सिर्फ 25% बच्चों ने इस बारे में किसी को दूसरे को बताने की हिम्मत की थी और केवल 3% ने पुलिस में शिकायत की थी. मतलब 72% चुप ही रहे थे. क्योंकि उन्हें खामोशी ही भली लगी थी.
लगातार किसी न किसी अप्रिय घटना से दो-चार हो जाना आम हो रहा है. एनसीआरबी का डेटा कहता है कि देश में हर 14 मिनट में एक औरत यौन उत्पीड़न का शिकार होती है. साल 2016 में कुल मिलाकर रेप के 38,947 मामले देश भर में दर्ज किए गए. कुल 66,544 औरतों को अगवा किया गया. ये वे मामले हैं जिन्हें पुलिसिया रिकॉर्ड में जगह मिलती है. कितने ही मामलों में लोग चुप रह जाते हैं- शर्म या डर से. ये दोनों भाव इतने हावी हैं कि कहना ही क्या. ये इसी से समझा जा सकता है कि पिछले साल दिल्ली के एक रेप्यूटेडेड स्कूल में दसवीं की एक रेप विक्टिम स्टूडेंट को ग्याहरवीं में इसलिए दाखिला नहीं दिया गया क्योंकि इससे स्कूल की इमेज खराब हो सकती थी.
कहने का तात्पर्य ये कि लगातार किसी न किसी अप्रिय घटना से दो-चार हो जाना अब आम हो रहा है. एनसीआरबी का डेटा कहता है कि देश में हर 14 मिनट में एक औरत यौन उत्पीड़न का शिकार होती है. साल 2016 में कुल मिलाकर रेप के 38,947 मामले देश भर में दर्ज किए गए. कुल 66,544 औरतों को अगवा किया गया. ये वे मामले हैं जिन्हें पुलिसिया रिकॉर्ड में जगह मिलती है. कितने ही मामलों में लोग चुप रह जाते हैं- शर्म या डर से. ये दोनों भाव इतने हावी हैं कि सभ्य समाज की अभद्रता पर प्रश्न उठता है उदाहरण के लिए पिछले साल दिल्ली के एक रेप्यूटेडेड स्कूल का मामला ले लीजिये जब इस विद्यालय में दसवीं की एक रेप विक्टिम स्टूडेंट को ग्याहरवीं में इसलिए दाखिला नहीं दिया गया क्योंकि इससे स्कूल की छवि खराब हो जाती.
तो क्या ये देश लड़कियों, औरतों के लिए भयावह हो चुका है…, जहां रोजाना रेप और हिंसा की इतनी घटनाएं होती हैं कि आप हिलकर रह जाते हैं…., या फिर आप प्रभावहीन हैं. अखबार पलटकर रख देते हैं. रिमोट से चैनल बदल देते हैं. किसी सुखद खबर की तरफ मुड़ जाते हैं या फिर सीरियल की हंसती नायिका को देख तसल्ली कर लेते हैं कि सब कुछ अच्छा चल रहा है. हादसे होते रहने का अपना मामूल hai बस शहर बदल; जाते है जैसे जींद, पानीपत, फरीदाबाद……… आदि तो वबहीं पीड़िता की उम्र बदल जाती है पर मामले वही वीभत्स, कुत्सित, रौंगटे खड़े कर देने वाले. ज़रा एक बार स्वं से प्रश्न पूछियेगा.