गांधीजी, तो अब ! ऐसा देश है मेरा ?

             देश की राजधानी दिल्ली का जाएज़ लीजिये, सड़क कम गाड़ियां ज्यादा, कंक्रीट की सड़कों पर गाड़ियों का जंगल बेहयाई से उगा जा रहा है. अगर आप इस हुजूम में फंस गये तो क्या रात क्या दिन, ज़िंदगी बसर सड़क पर ही होती प्रतीत हो रही है, या फिर लाखो की गाड़ी हो या करोड़ों का बैंक बैलेंस सडक पर इस तरह फंसे तो सबकुछ धरा का धरा रह जाता है. क्योंकि यहां सिस्टम नहीं पैसा काम करता है, और पैसा इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं सुविधा देखता है. सोचिये जनता के लिये 20 मेट्रो , 10 हजार बस टेम्पो टैक्सी पर अस्सी लाख कार इस कदर हावी है कि आधी उम्र तो सडक पर गाड़ी में बैठे बैठे बीत जाती है क्योंकि ये दिल्ली है. बात दरअसल दिल्ली की नहीं भारत देश की हो रही है जहाँ दिल्ली जैसे दर्जनों शहर हैं जिनका हाल कामोबेश दिल्ली जैसा है. लेकिन, आज के परिदृश्य में झांकी अगर देश की देखनी हो तो फिर नजर आयेगा सिर्फ पानी,पानी और सिर्फ पानी . जी ये हाल उत्तराखंड , यूपी, बिहार, बंगाल, असम समेत आधे भारत का है, और इस पानी तले कुल 15 करोड 96 लाख हेकटेयर जमीन में से 2 करोड़ 30 लाख ङेक्टेयर जमीन डूबी हुई है. वहीं खेती की जमीन पर निर्भर साढे तीन करोड किसान-मजदूरो के परिवारों को कोई पूछने वाला नहीं. 215 से ज्यादा जान बीते हफ्ते भर में पानी की वजह से जा चुकी है. और ये वही देश है, जहां बीते साल भर में सूखे के वजह से 1800 से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी कर ली. तो सूखे से जुझना और बरसात के पानी में डूबना देश का ऐसा अनूठा सच है जहां इक्सवी सदी में विकास का हर नारा झूठ सा लगता है. दिल्ली से सटे गाजियाबाद में स्कूल की फीस ना चुका पाने के हालात एक लड़की को खुदकुशी करने पर मजबूर कर देते हैं, ये तो दिल्ली से सटे क्षेत्र की बात है सो जग ज़ाहिर होगी, वरना देश के कोने कोने इन अवस्थाओं की शिकार कितनी मासूम आवाज़ प्रतिदिन दब जाती हैं. क्योंकि मां बाप से ही स्कूल के शिक्षक मारपीट करने लगते हैं. तो दुसरी तरफ बेरोजगारी की त्रासदी हर दिन दो सौ से ज्यादा बच्चों को घर छोडने पर मजबूर होना पड़ता है. अब इन परिस्थितियों में बच्चों को कौन सा पाठ पढाये ये सवाल बन जाता है, क्योंकि मुश्किल कल की नहीं मुश्किल तो आज की है.

शिक्षा के मद्देनज़र देश का सच ये है कि आज भी 22 फिसदी बच्चे स्कूल नहीं जा पाते. वहीँ । से 8 वी तक 37 फिसदी बच्चे मजदूर बनने के लिये स्कूल छोड़ देते हैं। 10 वीं पास करने वाले महज 21 फीसदी बच्चे होते हैं. सिर्फ दो फिसदी उच्च शिक्षा ले पाते है. और उसमें से भी 70 फीसदी देश में पढाई के बाद काम नहीं करते विडम्बना ये कि अधिकतर विदेश रवाना हो जाते है. और इसी देश में शिक्षा के नाम पर कमाई करने वाले हर बरस साढ़े चार लाख करोड़ का कारोबार करते है. सरकार के शिक्षा के बजट से तीन गुना ज्यादा रईस परिवार अपने बच्चों को विदेश में पढ़ने के लिये हर बरस खर्च कर देते है. अब सोचिये तो देश कहां जा रहा है, कौन सोचेगा ? ये भी तो नहीं कह सकते ये सब कल की बाते है इन्हें छोड दें. अतः संविधान के तहत दिया गया शिक्षा का अधिकार भी कटघरे में दिखायी देता है. तो आने वाले वक्त में कौन सी पौध देश संभालेगी ये सवाल तो उठेगा ही.

              आज जो कल बन रहा है उसका सच यही है कि देश की इक्नामी ही चंद हथेलियों पर सिमट रही है यानी देश की कुल इक्नामी 65,20,000 करोड की है जिसमें 10,00,000 करोड का कर्ज सिर्फ 12 कारपोरेट ने लिया है. तो वहीँ सीबीआई बैक फ्राड के 150 मामलों की जांच कर रही है जिसकी रकम महज 20,000 करोड है. तो देश की मजबूती किन हाथों में सौपे खासकर तब जब देश में सबसे ज्यादा व्यवस्था मोबाईल पर आ टिकी है । क्योंकि हाथों में मोबाईल से पानी के खौफ को भी सेल्फी में उतारने का जुनून है तो लातूर जैसे सूखे इलाके में पानी लाने की जगह सूखे को ही सेल्फी में उतारने की सोच मंत्री की दिली इच्छा से दो चार करती है. तो क्या विदेशी पूंजी पूंजी और विदेशी तकनीक से रास्ता निकल सकता है. क्योंकि स्वदेशी की सोच विदेशी पूंजी तले कैसे काफूर हो गई और मान लिया गया कि एफडीआई के जरीये देश विकास के रास्ते चल सकता है. उद्योग धंधों में रफ्तार आ सकती है. रोजगार बढ सकता है. लेकिन, उद्योग धंधों की रफ्तर रुकी हुई है, रोजगार पैदा हो नहीं पा रहे, नई इंडस्ट्री लग नहीं रहीं, खेती-उघोग का योगदान जीडीपी में घटते घटते 1950 के 86 फिसदी से घटते घटते 34 फिसदी पर आ गया है, और स्वदेश का पाठ वाकई पीछे छूट गया, जो हुनर को रोजगार देता, जो रोजगार से सरोकार बनाता, यही सरोकार देश बनता.

              जरा स्मार्ट सिटी के सच को समझ लें, क्योकि जिस वक्त दिल्ली में स्मार्ट सिटी पर राष्ट्रीय सम्मेलन हो रहा था, उसी वक्त दिल्ली से सटे मिलेनियम सिटी यानी गुडगांव में सबकुछ ठप पडा था, और पीएमओ में राज्य मंत्री ये समझा ही नहीं पा रहे थे कि आखिर स्मार्ट सिटी होगें कैसे. क्योकि अभी तो हम जिन शहरों को हम साइबर सिटी से लेकर स्मार्ट शहरों के रुप में जानते-पहचानते आए हैं-उनका हाल कैसे हर किसी को बेहाल कर देता है ये हर बरसात में सामने आ जाता है तो सवाल उन स्मार्टसिटी का है,जिन्हें स्मार्ट बनाने का दावा करते हुए कहा तो यही जा रहा है कि स्मार्टसिटी बनते ही सब कुछ ठीक हो जाएगा।

                  तो क्या स्मार्ट शब्द उस आधुनिकता से जुडा है जहा टेकनालाजी पर टिकी पूरी व्यवस्था होगी, तो क्या स्मार्ट सीटी में पैर जमीन पर नहीं आसमान में रखे जायेंगे, क्योंकि देश में सौ स्मार्ट सिटी के लिये जो बजट है और शहरी व्यवस्था को सुधारने का जो बजट है अगर दोनो को मिला दिया जाये तो 7296 करोड़ रुपया है. जिसमें स्मार्ट सीटी के लिये 4091 करोड बजट रखा गया है । तो कल्पना किजिये जो गुडगांव सिर्फ एक बरसात में कुछ ऐसा नाले में तब्दील हुआ, कि वहां 22 घंटे का जाम लग गया और हालात नियंत्रण में लाने के लिये धारा 144 लगानी पडी, उस गुडगांव नगर निगम का सालाना बजट 2000 करोड़ का है । यानी गुडगांव के अपने बजट से सिर्फ दुगने बजट में देश में 20 स्मार्ट सिटी बनाने की कल्पना की गई है. तो सवाल दो है, स्मार्ट सीटी का रास्ता सही दिशा में जा नहीं रहा या फिर भारतीय मिजाज में स्मार्ट सीटी की सोच ही भ्रष्टाचार की जननी है ? क्योंकि गुडगांव ही नहीं बल्कि बैंगलोर हो या मुबंई या फिर देश का कोई भी शहर, किसी भी शहर का इन्फ्रास्ट्रक्चर इस तरह तैयार किया ही नहीं गया कि अगल दस से बीस बरस में शहर की आबादी हर नजर से अगर दुगुनी हो ये तो क्या शहर की व्यवस्था चरमरायेगी नहीं. 70 से 90 के दशक के बाद से किसी शहर के इन्फ्रस्ट्क्चर में कोई बदलाव हुआ ही नहीं. 30 एमएम से ज्यादा बरसात होने की निकासी की कोई व्यवस्था किसी शहर में हुई नहीं. जबकि दस लाख से उपर की आबादी वाले सौ से ज्यादा शहरों में बीते दो दशक में आबादी तीन गुना से ज्यादा बढ चुकी है तो ग्लोबल वार्मिग ने मौसम बदला, लेकिन, बदलते मौसम का सामना करने के लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर बदल कर मजबूत कैसे किया जाये इस दिशा में कोई गंभीरता किसी सरकार ने कभी दिखायी ही नहीं.

और तो और स्मार्ट सीटी का खाका तैयार करने वाले नौकरशाहों के आंकडों को समझें तो उनके मुताबिक 13 करोड लोगो को स्मार्ट सिटी के बनने से फायदा होगा. यानी सवा सौ करोड के देश में जब जीने की न्यूनतम जरुरतों के लिये -हर बरस गांव से 80 लाख से एक करोड ग्रामीणों का पलायन शहर में हो रहा है, तो शहरो के बोझ को सहने की ताकत बढ़ाने की जरुरत है या गांव को स्मार्ट या कहें सक्षम बनाने की जरुरत है ? या फिर देश की इकनामी से ग्रामीण भारत को जोड़ने की जरुरत है ?