दलित राजनीति अभी जारी है !

पिछले १ महीने से उत्तरप्रदेश का सहारनपुर का अमन-चैन दो समुदायों एवं जातीय संघर्ष का शिकार बना हुआ है. २० अप्रैल को सांसद राघव लखन पाल के नेतृत्व में भाजपा समर्थकों की रैली मुस्लिम बहुल क्षेत्र में निकलती है और देखते ही देखते राघव समर्थक और मुस्लिम समुदाय के बीच झड़प होजाती है. तो दूसरी तरफ बाबा साहब की प्रतिमा लगाने पर ठाकुरों द्वारा अड़चन से मानवता को तार तार करने का जो सिलसिला आरम्भ हुआ वह बदस्तूर जारी है, और तो और ठाकुरों द्वारा महाराणा प्रताप की जयन्ती पर निकाली गई शोभा यात्रा का विरोध दलितों ने कर दिया, देखते ही देखते खूनी संघर्ष सरे-राह अपना रास्ता बनाता चला गया. कुल मिला कर हिंसा तो हिंसा है वह चाहे जातीय हो या फिर सामुदायिक या धार्मिक, अहिंसा के देश में हिंसा कई सवाल उठा रही है वह भी तब जब उत्तरप्रदेश के गृह सचिव ने स्वीकारा है कि वाकई हिंसा के इस पूरे सिलसिले में पुलिस प्रशासन की नाकामी ही जिम्मेदार है. फिर भी पूरे प्रकरण में राजनीतिक षड़यंत्र की आती बू को कैसे नकार सकते हैं ? इन सब के बीच ‘भीम सेना’ का अस्तित्व में आना और इनका कभी बसपा तो कहें भाजपा से तार जोड़ने का सिलसिला जरी है.

दलित राजनीति अभी जरी है !

इन सबके बीच ये याद करना जरूरी है कि ये वही सहारनपुर है जहाँ से भाजपा ने २०१७ चुनाव हेतु ‘परिवर्तन रैली’ के नाम से शंखनाद करते हुए सर्वसमाज को जोड़ने की पहल की थी. तो इसी सहारनपुर से जन्मी भीम आर्मी को शिखण्डी बनाये जाने की प्रक्रिया सरे राह अंजाम देने की कोशिश जरी है. बावजूद इसके भीम सेना को आर्थिक मदद दिए जाने के अंदेशे में कई अलग दलों के ६ नाम भी उछले हैं, इनमें एक अल्पसंख्यक कद्दावर नेता भी बताये जा रहे हैं.
क्या दलित वोटों की सेंध मारी से लेकर उन वोटों को भविष्य के लिए सहेजने हेतु दलित इतने सस्ते होगये हैं कि उनपर राजनीतिक बिसात भी बिछाई जाये और वक्त दर वक्त इनके मात खाने का सिलसिला इनपर की जारही राजनीती के भरोसे ही देखा जाये. आज अगर दलित राजनीती नए कलेवर में परोसी गई तो है, तो याद कीजिये किस तरह भाजपा ने बाबा साहब भीम राव आंबेडकर की जन्मस्थली से लेकर मरणस्थलीय को तीर्थस्थलीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा, जिसका प्रमाण भी है UP की दलित सीटों पर भाजपा की ऐतिहासिक विजय. यही नहीं गुजरात के पटेलों की तरह UP के दलितों ने हार्दिक पटेल की तरह चंरशेखर आज़ाद पा लिया. जो जंतरमंतर तक भीम आर्मी का झंडा बुलंद कर आये. तो क्या सारी शाह-मात २०१९ संसदीय चुनाव के मद्देनज़र चल रही है ???