ना बापू हैं, ना ही जनता में समझ, ……तो नेताओं का स्वार्थ क्या यूँ ही हिंसा जारी रखेगा ?

जवाब पर जवाब देते रहने की संकल्पना से हिंसा की चिंगारी ज्वालामुखी की ही रचना करती है, तभी तो सब्जरंग से सजा धजा समाज इस कदर भस्म होजाता है किउसकी राख भी खाक हो जाती है , ताकि असामाजिकता की आत्मा को शांत रखने हेतु उस राख को नदी की धरा में प्रवाहित कर समाज के भविष्य को शन्ति , सुख के साथ विकास प्रदान किया जा सके.
जी बात आज के परिदृश्य में अपने भारत की हो रही है जिसकी नस नस में ज़हर घुलता चला जारहा है और सर्वधर्म सद्भाव की मिट्टी में कड़ुवाहट का ये सिलसिला ‘ घर वापसी ‘ से जो आरम्भ हुआ वह लुका छिपी करते हुए हिंसा के अनचाहे बीज बोता रहा. और देखते ही देखते यूपी , झारखण्ड, हरियाणा, मध्यप्रदेश………आदि के बाद पश्चिम बंगाल में असामाजिकता की अनचाही फसल अब बंगाल की मिट्टी को उस नक्सलवादी अभिशाप के दौर में धकेलने पर आमदः है, जिससे बंगाल को उबरने में ज़माने लग गए.
अगर बात सिर्फ बंगाल की करते हैं तो समझ लीजिये बीते वर्ष 2016 में 11 बार सांप्रदायिक दंगे की चपेट ने तो वहीं 2017 में आलमपुर के बाद बशीर हाट की घटना ने ‘ माँ माटी मानुष ‘ की सामाजिक धरती को सांप्रदायिक रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
इधर भाजपा राज्य सरकार की तो वहीं राज्य सरकार भाजपा पर निशाने साधने से बाज़ आ नहीं रही है. जो इशारे के लिए काफी हैं कि किस प्रकार भाजपा पश्चिम बंगाल में ठौर की तलाश हेतु किसी भी हद तक जासकती है तो वहीं TMC अपनी साख बाचने की जद्दो जहद कर रही है. लेकिन, इन हालातों में पिसती जनता अब सांप्रदायिक घृणा के एक ऐसे सफर पर निकल चुकी है जो पश्चिम बंगाल में उसकी सभ्यता के विपरीत गहराते सांप्रदायिक उन्माद हेतु खतरे की की निशानदेही है.


दो जुलाई 2017 को एक किशोर ने फेसबुक पर भड़काऊ पोस्ट डाला था. बादरिया के स्थानीय मुस्लिम निवासी उस दिन शाम से विरोध करने लगे . आरम्भ में स्थानीय पुलिस के हस्तक्षेप ने तनाव पर काबू पाने की कोशिश की लेकिन पलीते में लगी आग बुझाने से क्या होता है. जबतक कि पलीते की जड़ और हिंसक बारूद के कनेक्शन को निस्तनाबूद ना किया जाये. देखते ही देखते ४८ घंटे में आस पास के इलाकों में असामाजिकता के नंगे नाच ने मन चाही हिंसा सरे राह कर दी. हमेशा की तरह नेताओं की प्रवृत्ति के अनुसार कुछ TMC नेताओं ने तो कुछ भाजपा नेताओं ने असामाजिकता की डोर अपनी उँगलियों से घुमाते रहे और असामाजिकता कठपुतली बन हिंसा का नाच दिखाती रही.

वर्ष 1947 के विभाजन के दौरान पश्चिम बंगाल स्वतंत्र भारत में सांप्रदायिक राजनीति का जोरदार केंद्र बन सकता था. लेकिन, उपवास और निवेदन के रूप में महांत्मा गांधी के हस्तक्षेप से लेकर नेताओं और जनता की समझदारी ने पश्चिम बंगाल को दंगे से महफूज़ रखा. लेकिन, आज ना तो बापू हैं, ना ही जनता में समझदारी बरकरार है, आज नेता स्वार्थ का चोला छोड़ समझदारी का दमन पकड़ना ही नहीं चाहते, क्यों कि बापू के दौर की तुलना में आज का भारत अधिक विकसित हो गया है ?