न राम की भक्ति होगी, न खुदा की इबादत होगी, क्या ताउम्र इस ज़मीन पर वोटों की सियासत होगी ?

                   बेशक कलराज मिश्रा, साक्षी महाराज, साध्वी प्राची, निरंजना ज्योति, सुब्रमण्यम स्वामी आदि की तुलना में राजनाथ सिंह बीजेपी और मोदी सरकार दोनों में ही कहीं ज़्यादा रसूख़ वाले नेता हैं. उनके द्वारा राम मन्दिर को लेकर दिया गया बयान तकनीकी तौर पर भी सटीक बैठता है. जो सिद्ध भी करता है कि राम मन्दिर के सिलसिले में कलराज, साक्षी और सुब्रमण्यम जैसे नेताओं की बयानबाज़ी पूरी तरह से लफ़्फ़ाज़ी है. इस लफ़्फ़ाज़ी को किस हद तक सार्थक समझा जाना चाहिए ? क्या बीजेपी के छुटभय्ये नेताओं की लफ़्फ़ाज़ी से पार्टी और उसके नेतृत्व नरेन्द्र मोदी की साख पर बट्टा लगता जा रहा है ? क्या इन लफ़्फ़ाज़ियों से बीजेपी के समर्थक ख़ुश होते हैं ? या फिर भाजपा के विरोधी और ख़फ़ा हो जाते हैं ? ज़ाहिर है, लफ़्फ़ाज़ी महाराजाओं ने दिमाग़ से कभी काम लिया नहीं, न ही किसी के समझाने से कभी समझे हैं , तो क्या वो बने ही ‘सेल्फ़ गोल’ करने के लिए हैं ?

               अयोध्या में विवादित ज़मीन पर राम लला का भव्य मन्दिर बनवाने का बीजेपी का संकल्प उसके जन्म से भी पहले का है. जी हाँ ये जनसंघ के दौर में भी था, उससे भी पहले हिन्दू महासभा के युग में भी था. अब बीजेपी ने इसके लिए तीन विकल्प रखे हैं. पहला, ‘आपसी सहमति से’, लेकिन, डेढ़ सौ साल से जारी अदालती झगड़े का ज्ञात इतिहास बताता है कि ‘आपसी सहमति’ कैसी टेढ़ी खीर है. दूसरा विकल्प है ‘अदालत का फ़ैसला’, अदालतें इस झगड़े को 1885 से अब तक यानी 130 साल में सुलझा नहीं सकी हैं, जो अभी सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है. तीसरा विकल्प है ‘संसद से क़ानून बनाकर’, बीजेपी कहती रही है कि जिस तरह गुजरात स्थित सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिए संसद ने क़ानून बनाकर रास्ता साफ़ किया, वैसा ही अयोध्या में राम लला के लिए होना चाहिए. लेकिन इसके लिए अन्य दल तैयार नहीं हैं. इसीलिए संसदीय क़ानून की बातें भी सिर्फ़ बातें ही हैं.

                    केंद्र सरकार के लघु और मध्यम उद्योग मंत्री कलराज मिश्रा ने देश में नया शिगूफा छोड़ा कि ‘ज़रूरत पड़ेगी तो संसद से क़ानून बनाकर मन्दिर निर्माण का रास्ता साफ़ किया जाएगा’. क्या वो ख़ुद जानते कि ‘ज़रूरत पड़ेगी’ का मतलब क्या है? अब सवाल उठता है कि बीजेपी और नरेन्द्र मोदी सरकार को ‘संसद से क़ानून बनाकर मन्दिर निर्माण का रास्ता साफ़ करने’ से किसने मना किया है ? इन सब के बीच उन्होंने सफ़ाई दी कि ‘बीजेपी ने आम सहमति, अदालत के फ़ैसले या संसद से क़ानून बनाकर अयोध्या में मन्दिर निर्माण का वादा किया था, बीजेपी आज भी अपने वादे पर क़ायम है.’

                    कलराज किसी ‘उच्च स्तरीय चिन्तन मंडली’ का हिस्सा भी नहीं हैं, न ही वो पार्टी के प्रवक्ता हैं जिन्हें ऐसा बयान देने के लिए कहा गया हो. तो अब ऐसी बातें कलराज की लफ़्फ़ाज़ी नहीं तो क्या है ? ऐसी माँगें हमेशा बीजेपी की जानकारी में रखकर ही उठायी जाती हैं, वह भी गम्भीरता से विचार करने के बाद.तो क्या उनकी हस्ती ‘बेग़ानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ जैसी ही है ? इसीलिए उनकी बातों में कोई प्रमाणिकता नहीं हो सकती. वैसे 7 फरवरी को इलाहाबाद में ये सारा ज्ञान देने के बाद कलराज कानपुर पहुँचे. वहाँ उन्होंने हरेक कौतूहल से ये कहकर पर्दा हटा दिया कि ‘उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुमत मिलने पर क़ानून बनाकर अयोध्या में मन्दिर का निर्माण कराया जाएगा.’ यानी ये था वो नौ मन तेल जो जुट गया तो राधा नाचेगी!

इससे पहले, 23 जून 2015 को कलराज मिश्रा ने मेरठ में कहा था कि ‘बीजेपी, राम मन्दिर को भूली नहीं है. लेकिन अभी मोदी सरकार की प्राथमिकता देश के विकास की है.’ सात महीने में ही कलराज मिश्रा को राम मन्दिर ने इसलिए बेचैन कर दिया क्योंकि अब चुनावी मौसम सिर पर है. तो क्या इसीलिए नरेन्द्र मोदी सरकार की प्राथमिकता को ‘विकास’ से बदलकर ‘राम मन्दिर’ करने की तैयारी है में जुट गए हैं कलराज मिश्र जी ?

बीजेपी के अगले लफ़्फ़ाज़ी महाराज यानी साक्षी महाराज जिन्हों ने 27 मई 2015 को उन्नाव में कहा था कि ‘अयोध्या में राम मन्दिर ज़रूर बनेगा. इसे भव्य रूप देने का काम लोकसभा चुनाव 2019 से पहले तक कर लिया जाएगा.’ उन्होंने ये भी कहा कि ‘राम मन्दिर का मुद्दा बीजेपी का नहीं हम संतों का है.’ बीजेपी के एक और ‘सूरमा लफ़्फ़ाज़’ सुब्रमण्यम स्वामी ने 7 जनवरी 2016 को दिल्ली में वीएचपी के कार्यक्रम में दावा किया कि दो-तीन महीनों में या साल के अन्त तक अयोध्या में राम मन्दिर का आमसहमति से निर्माण कार्य ज़रूर शुरू हो जाएगा. ये किसी आन्दोलन से नहीं बल्कि अदालती आदेश और आपसी सहमति से होगा. अगस्त-सितम्बर तक इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आ जाएगा. स्वामी ने कहा कि इस मुद्दे को आपसी सहमति से सुलझाने की कोशिश हो रही है ताकि अयोध्या में सरयू के दोनों किनारों पर मन्दिर और मस्जिद का निर्माण हो सके.

बीजेपी की दिक़्क़त ये है कि अटल युग (1998-2004) हो या फिर आज का मोदी युग, इन दोनों ही दौर में एनडीए का जन्म ही राम मन्दिर जैसे विवादित मुद्दों को दरकिनार करके हुआ था. साफ़ है कि क़ानून का विकल्प सिर्फ़ हवा में है. हरेक संघवंशी इन बातों को समझता है. इसीलिए वक़्त देखकर ‘राम मन्दिर’ की प्राथमिकता बदली जाती है? 1990 में हुई लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के वक़्त से हमेशा चुनावी मौसम में संघवंशियों को राम मन्दिर बेचैन करता है. इसका एक ही मक़सद होता है कि चुनावी माहौल में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को गरमाना ताकि सियासी रोटियाँ सेंकने में आसानी हो.

गौर करने की बात ये है कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह, 10 मई 2015 को अयोध्या में ही साफ़ कर चुके हैं कि ‘राम मन्दिर निर्माण के लिए प्रस्ताव लाने और क़ानून बनाने के रास्ते में राज्यसभा में बहुमत की कमी आड़े आ रही है. इसीलिए राम मन्दिर के लिए संसद में प्रस्ताव लाना सम्भव नहीं होगा.’ उनसे ये भी पूछा गया कि यदि बीजेपी को आने वाले दिनों में राज्यसभा में बहुमत प्राप्त हो जाए तो क्या वो राम मन्दिर के लिए प्रस्ताव लाएगी? राजनाथ ने कहा, ‘यह काल्पनिक सवाल है. केन्द्र में सत्ताधारी बीजेपी के पास राज्यसभा में 45 सदस्य हैं. इसकी उम्मीद नहीं है कि मोदी सरकार के वर्तमान कार्यकाल में उसे राज्यसभा में बहुमत प्राप्त होगा. 243 सदस्यीय राज्यसभा में विपक्ष के पास कम से कम 132 सदस्य हैं.’ ऊपरी सदन में अभी बीजेपी की सदस्य संख्या 48 है. इसके अलावा 13 से 15 सीटें एनडीए के सहयोगी दलों के पास हैं.

कौन नहीं जानता कि ‘अयोध्या में भव्य राम मन्दिर का निर्माण’ बीजेपी के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व और धार्मिक आस्था का बुनियादी मुद्दा है! विवादित ज़मीन पर राम लला के भव्य मन्दिर की ‘ज़रूरत’ तो उसी दिन से है, जब से ये विवाद है! झगड़ा है तभी तो मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है. अतः जब तक अदालत अन्तिम रूप से अपना फ़ैसला नहीं दे देती, तब तक किसी न किसी रूप में मामले को गरमाये रखना सत्ता -सह- विपक्ष के लिए राजनितिक रोटी सेंकने हेतु ज़रूरी है.