पत्रकार सुरक्षा कानून आखिर कब ???

बीते जून के महीने में पत्रकारों को दर्द का एहसास बार बार कराया गया , वह भी तब जब पत्रकार दर्दहीन होकर निडरता पूर्वक देशवासियो की आवाज़ बनते रहे है . फिर भी प्रश्न उठेगा की मीडिया का दुःख कौनसुनेगा, कौन कहेगा, कौन समझेगा ???
देश की स्वतंत्रता पूर्व अंग्रेज़ो को मीडिया के प्रभाव का पूर्ण अनुभव हो चूका था . यही कारण है की अबुल कलाम आज़ाद से लेकर न जाने कितने देश भक्तों ने अख़बार को हथियार बनाया. परिणाम भी मिला , देश ने आज़ादी पाई, और देश ने अपने संविधान में जीना आरम्भ किया, शायद इसी लिए देश की आरम्भिक सरकारों ने मीडिया के महत्त्व को देश के स्वास्थ का अभिन्न हिस्सा करार दिया . लेकिन, प्रश्न आज ये उठता है की बीते दौर की तुलना में क्या आज मीडिया को अधिक महत्त्व दिया जा रहा है, शायद इसी लिए सर्वाधिक जोखिम मिडिया की ज़िन्दगी उठा रही है. फिर ये कैसी विडंबना है की हर कुछ दिनों में मीडिया की जान जिस सरलता से ले ली जाती है मनो मीडिया कोई इंसान नहीं कीड़े मकोड़ों का ज़खीरा हो.
जून की तीन तारीखें तारिख में ऐसी दर्ज हुई जिसे मीडिया भूले से भी याद नहीं करना चाहेगी . बात १, १४ और २१ जून की है जो मीडिया की सोतंत्रता पर लगे ग्रहण के दर्द को बयां करती है, ये वही घटनाए है जिसने इस विशाल लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को हिलाने की जुर्रत की है .
बात शाहजहाँपुर में एक जून की है, जब स्वतंत्र पत्रकार जोगिंद्र सिंह को उनके घर में घुस कर पुलिसकर्मिओ द्वारा जला दिया ., मतलबव साफ़ है , रक्षक कैसे भक्षक बन गए ????? जोगिंद्र ने ८ जून को अंतिम सांस लेते हुए मजिस्ट्रेट के सामने अपने दर्ज बयां में मंत्री राम मूर्ति सिंह यादव को हमले के लिए ज़िम्मेदार बताया . जिनकी पोल जोगिंद्र ने अपने कालम और ब्लॉग में खोली थी .
तारिख १४ जून , उत्तरप्रदेश के पीलभीत ज़िले में पत्रकार हैदर खान जो ज़ी टीवी के स्ट्रिंगर थे उन्हें कुछ लोगो ने मोटर साईकिल से बाँध तब तक घसीटता रहा जब तक वह बेहोश नहीं होगए थे .
तारिख २१जुने , संदीप कोठारी की जली हुई लाश नागपुर में मिलने की खबर आई . अहम बात ये है की संदीप मध्यप्रदेश के बबलपुर से थे जिन्हे काफी पहले ही अगवा किया गया था .
तीनो घटनाओं के ज़िक्र के बाद एक और आंकड़े पर नज़र डालते है, २०१४ में भारत के पत्रकारों के खिलाफ हुए कुल अपराधों में से ७२% सिर्फ उत्तरप्रदेश में घटित हुए है.
अंतर्राष्ट्रीय संघटन ‘ रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स ‘ ने २०१३ की अपनी सालाना रिपोर्ट में भारत को पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक ५ देशो की सूचि में शामिल किया .
असल में भूमण्ड़लीकरण के इस दौर में आर्थिक उदारीकरण ने बज़ारूंमुख विदेशी पूंजी की आवाजाही बढ़ी , जिसने मीडिया जगत को सौदे के बाजार में धकेल दिए . अर्थात व्यवसाईकरण ने पत्रकार की परिभाषा को लगभग बदल डाला . अब इन हालातों में मीडिया दो तबकों में बंट गया . एक तबका ऐसा है जो अक्सर खबरों की आहुति देते हुए निजी स्वार्थो की पूर्ति करता जो करप्शन से उपजे अपराध को बढ़ावा देता है. वहीँ दूसरा तबका आज भी तमाम दबावों के बावजूद पेशेगत प्रतिबद्धता को समर्पित है. शायद इसी लिए ये तबका पर्दाफाश का बेड़ा उठाने में हिचकता नहीं इसी लिए ये जान लेवा हमलो का शिकार होता है.
दुखद ही नहीं निंदनीय है की पत्रकारों की इन दशाओ से सरकार न कल अनजान थी न आज अनजान है . इसके कई कारन हैं. जहाँ कल की तुलना में आज की मीडिया अधिक विकास कर चुकी है वही कल की तुलना में आज उनकी एकता में भरी कमी आई , वह भी तब जब ढेरो पत्रकार संगठन गठित हो रहे है. लेकिन किसी को उपरोक्त घटनाओ से सीख लेने में कोई दिलचस्पी नहीं . फिर सरकार को क्या पड़ी है ? फिर भी २०१३ से प्रेस कौंसिल यह कह रही है की सरकार पत्रकार सुरक्षा सम्बन्धी कानून पर धेयान दे. लेकिन संसद में आज भी इसका प्रस्ताओ नहीं पहुंचा .