पाकिस्तानी कार्रवाई कितनी हकीकत कितना फ़साना ???

याद कीजिये, बैंकॉक में भारत-पाक सुरक्षा सलाहकार मिलते हैं अमेरिका से तारीफ मिलती है. हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ‘हार्ट ऑफ़ एशिया’ सम्मलेन हेतु इस्लामाबाद जाती हैं, अमेरिका की तरफ से वेलकम होता है. प्रधानमंत्री अचानक लाहौर उतरते हैं, अमेरिकी विदेश मंत्रालय वेलकम में जुट जाता है. कूटनीतिक वेलकम करता अमेरिका आखिर किस उतावलेपन का शिकार है की उसे ३ जनवरी को मज़ारशरीफ स्थित भारतीय कौन्सिलवास हुए हमला दिखाई नहीं पड़ता, इस हमले में पाकिस्तानी सैनिकों के शामिल होने की पुष्टि बाल्ख प्रान्त के पुलिस प्रमुख सैयद कमाल ने की. अमेरिकी आँखें क्यों बंद होजाती हैं जब पठानकोट हमले में मरे गए आतंकवादी के पास अमेरिका की बनी दूरबीन मिलती है, जिसे अमेरिका ने सिर्फ पाकिस्तान सेना को बेचा था.

उपरोक्त बातें जाएज़ हैं, याद कीजिये, १९९३ मुंबई बम धमाके से लेकर २६/११ तक हमलों के गुनहगारों में से किसी एक को न तो पाकिस्तान ने सजा दी नहीं भारत के हवाले किया. हद तो यह है की जिस अपराधी को भारत ने वांटेड घोषित किया उसे पाकिस्तान ने नापाक शरण ही दी, मसूद अज़हर इसका जीता जगता उदाहरण है. पठानकोट हमले के लिए ज़िम्मेदार माने जा रहे आतंकी संगठन के सरगना मसूद अज़हर एवं उसके साथियों के धरा पकड़ी का शिगूफा मीडिया में खूब सुनाई दिया. लेकिन जायज़ प्रश्न ये है कि क्या वाक़ई पाक कार्रवाई हकीकत है याफिर कागज़ी कार्रवाई ban सिर्फ फ़साना ही साबित होगी ?
आज तक का पाक कि ओर से नापाक सच यही रहा है कि पाकिस्तान ने भारत में खून-खराबा करने और दहशत फ़ैलाने वाले गुनहगारों के खिलाफ कोई कार्रवाई कभी कि ही नहीं. इतिहास गवाह है के पाक पहले साबुत मांगता है फिर उसे अपर्याप्त बता वक़्त पार करता रहा है. पकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय दबाव में कुछ को हिरासत मन लेता ज़रूर है लेकिन कुछ वक़्त बाद उसे बारी कार्डेटा है, इसका जीता जगता उदाहरण लखवी का पाकिस्तान मन आज़ाद घूमना है.
दोस्ती कि शरुआती इबारत हमेशा भारत ने लिखी, इसकी अगली कड़ी प्रधानमंत्री मोदी का लाहौर सफर रहा, लेकिन, इस पहल की बदनसीबी ही तो है कि १५ जनवरी को होने वाली वार्ता फिर एक बार रद्द हो गई. लेकिन, पाक मीडिया का बड़ा हिस्सा इस समय दहशतगर्दी के विरुद्ध आ खड़ा हुआ है.
दरअसल हमारी आतंक प्रतिरोधक ढांचे में में कुछ मुलभुत कमियों के कारण हम आतंक के समक्ष असहाय होजाते हैं. इस पहलु पार देश को कड़ा अधीन करना होगा तो वहीँ कड़े कदम उठाने होंगे.