प्रधानमंत्री मोदी के उठते क़दम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शान से !

भारत को आज़ाद हुए ७ दशक पुरे होने को हैं, इन दशकों में आज तक भारत से सिर्फ ४ ही प्रधानमंत्री पाक गए, कांग्रेस से दो जवाहर लाल नेहरू (१९५३ एवं १९६०)और राजीव गांधी (१९८८ एवं १९८९) वहीँ भाजपा से भी दो अटल बिहारी बाजपेयी (१९९९ एवं २००४) और अब मोदी (२०१५)। जबकि कांग्रेस ने भाजपा की तुलना में अधिक भागीदारी केंद्र सरकार के कार्यकाल में दर्ज की है । आखिर पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने क्यों कहा था कि ” एक ऐसा दिन आए जब नाश्ता अमृतसर में हो, लंच लाहौर में और डिनर काबुल में “, कमोबेश वर्तमान प्रधान मंत्री का काबुल-लाहौर-दिल्ली टूर सरप्राइज़ मनमोहन सिंह की याद दिल गया ।

ऐतिहासिक नज़र में भारत पाक

१९४७ : नापाक ब्रिटिश सोंच ने भारतीय उपमहाद्वीप को दो भागों में विभाजित कर पाकिस्तान को १४ अगस्त तो भारत को १५ अगस्त के दिन आज़ाद मुल्क घोषित किया।विभाजन ने अपनों से बिछड़ने का कभी न भरने वाला ज़ख्म दिया, तो वहीँ हिंसा ने ऐसा पिशाचरूपी रूप धरा कि आजतक दोनों मुल्क इस श्राप से मुक्त नहीं हो पाए।
१९४७-४८ : पाकिस्तानी घुसपैठ ने युद्ध की ऐसी अनचाही परम्परा आरम्भ की, कि आज तक इस अनचाही गुलामी से आज़ादी नहीं मिली। इस युद्ध को देख कश्मीर के राजा ने भारत से मदद मांगते हुए रक्षा, संचार समेत विदेश मामलों को भारत सरकार के हवाले कर दिया ।१९४९ में सयुंक्त राष्ट्र की दखल पर युद्ध तो बंद हुआ, लेकिन जम्मू-कश्मीर के एक तिहाई हिस्से पर पाकिस्तान का कब्ज़ा होगया ।
१९५७ : जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा करार दिया गया।
१९६३ : ब्रिटिश और अमेरिकी देख रेख में कश्मीर विवाद के निपटारे हेतु भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों स्वर्ण सिंह और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के बीच सहमति बनी ।
लेकिन नतीजा न तब निकला, और आज तक बेनतीजा है ।
१९६४ : पाकिस्तान ने विफल कश्मीर मुददे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के हवाले किया ।
१९६५ : कच्छ के रण से युद्ध की अनचाही शरुआत हुई जो कश्मीर तक जा पहुँची, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के दखल पर युद्ध विराम हेतु समझौता हुआ ।
१९६६ : ताशकंद समझौता, गवाह बने प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाक राष्टपति अयूब खान, आर्थिक संबंधों पर ज़ोर ।
१९७१ : बंगला देश के मसले पर फिर एक बार भारत पाक आमने सामने हुए, १३ दिनों के युद्ध के पद ६ सितमबर १९७१ को बंगलादेश अज़द मुल्क घोषित हुआ ।
१९७२ : भारत की प्रधान मंत्री इंद्रा गांधी और पाक प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के बीच शिमला समझता ।
१९८८ : परमाणु समझौता,
१९८९ : पाकिस्तानी शह पर कश्मीरी विद्रोहियों ने सर उठाया और अलगाव वादियों ने अपना राग अलापना आरम्भ किया ।
१९९२ :रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल पर पाबंदी हेतु दोनों देशों में करार ।
१९९६ :नियंत्रण रेखा पर बढ़ते तनाव हेतु सैन्य अधिकारीयों के बीच बैठक ।
१९९८ :मिसाइल परीक्षण का दौर ।
१९९९ :प्रधानमंत्री अटल एवं पाक प्रधान मंत्री नवाज़ के बीच लाहौर समझौता, परमाणु दक्षता हासिल करने की होड़, कारगिल युद्ध का होना, सांय शासन का नया आधे जोड़ते मुशर्रफ तो वहीँ नवाज़ का अपदस्थ होना ।
२००१ :अटल – मुशर्रफ़ की बेनतीजा आगरा वार्ता ।
२००४ :इस्लामबाद सार्क वार्ता में अटल- मुशर्रफ की सीधी वार्ता द्वारा नियमित बातचीत पर सहमती।
२००६ :सीमा पर सुधरते हालत के मद्देनज़र भारत ने ५००० सैनिकों को जम्मू- कश्मीर से हटाया ।
२००८ :मुंबई का दर्दनाक ताज हमला पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब की गिरफ्तारी । दोनों देशों के रिश्ते में कड़ुवाहट बढ़ी ।
२००९ :मिस्र सम्मलेन के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुंबई हमलों से जुड़े दस्तावेज़ पाक प्रधानमंत्री गिलानी को सौंपे ।
२०१० :सीमा रेखा तनाव बढ़ा गोलियों की सिलसिला शरू । अजमल कसाब को फांसी की सजा सुनाई गई ।
२०१२ : कसाब को फांसी हुई ।
२०१३ : पुरे वर्ष सीमा रेखा पर गोली बारी जारी रही । न्यूयार्क में दोनों देशों के प्रधान मंत्रियों की मुलाक़ात ।
२०१४ :पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बता नया राग छेड़ा ।
मोदी कार्यकाल में भारत -पाक रिश्ते पर एक नज़र
मई/ २०१४ : प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में नवाज़ शरीफ की शिरकत, वहीँ पाकिस्तान सरकार द्वारा १५१ भारतीय मछुवारों की रिहाई ने सद्भावना की मिसाल प्रदर्शित की ।
अगस्त/ २०१४ : पाकिस्तानी राजनयिक की कश्मीर अलगाववादी से हुई मुलाक़ात ने तयशुदा विदेश मंत्रियों की मुलाक़ात को रद्द karaya ।
नवम्बर/ २०१४ :नेपाल सार्क सम्मलेन में प्रधानमंत्रियों की मुलाक़ात लेकिन द्वपक्षी वार्ता नहीं ।
मई /२०१५ :मोदी सरकार के १ वर्ष पुरे होने की अवधि में सीमा पर पाक की ओर से युद्ध विराम के उलंघन के ५०० से अधिक मामले ।
जून/२०१५ :मोदी के बयान पर पाकिस्तानियों की नाराज़गी ।
जुलाई /२०१५ :दोनों प्रधानमंत्रियों की ऊफ़ा मुलाकात ।
दिसंबर/२०१५ :मोदी शरीफ की पेरिस मुलाकात, शरीफ के जन्म दिन पर मीडिया को बिना बताए प्रधान मंत्री की लाहौर यात्रा वह भी २००४ के बाद अटल जी की यात्रा के बाद ।

                   भारत-पाक दोस्ती का एक नया अध्याय ?
भारत पाक रिश्ते पर अगर कलम चले तो नजाने कितनी किताबें लिख जाएंगी कह पाना संभव नहीं। मौजूदा पाकिस्तान दो हिस्सों में बंटा हुआ है, एक तरफ आर्मी है तो दुसरी तरफ कटटर धार्मिक संस्थाएं हैं दोनों ही आपने-अपने तरीके से काम करते हैं । दोनों के बीच सिर्फ तालमेल की ज़िम्मेदारी निभाने का काम पाक सरकार करते हुए सैंडविच रिश्ते जैसा माहौल तैयार करती है, रही बात पाक जनता की तो वह सैंडविच रिश्ते की उपज आतंकवाद, गरीबी, अव्यवस्था, विकास की महरुमियत आदि की नचाहकर भी शिकार हो रही है। इधर प्रधानमंत्री मोदी का रूस से अफगानिस्तान और फिर पाकिस्तान का दौरा सवेरे की नई किरण बन कर आया है, लेकिन एक बड़ा सवाल ज़रूर उठता है कि मोदी जी की गर्मजोशी भरी पहल को आगे आने वाले दिनों में पाकिस्तानी सरकार, जनता और सेना का कितना सहयोग मिलेगा ।
पाकिस्तान के दिल लाहौर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की १५० मिनट की यात्रा विश्व में सकारात्मक सन्देश कह गई, लेकिन भारत के कई राजनितिक दलों ने इसे नकारात्मक दृष्टि से भी देखा है, असल में महत्वपूर्ण ये है कि अब बात हो रही है वह चाहे विदेश मंत्री की यात्रा से आरम्भिक पहल हो, या फिर मोदी जी का सरप्राइज़ या फिर आने वाले दिनों में सचिव स्तर की की वार्ता । लेकिन नए साल पर इस दौरे की सार्थकता कैसी और किस दिहा में होगी कहना पाना जल्दबाज़ी हो सकता है ।