प्रभु जो नहीं सुनोगे रेल यात्रियों की पुकार, कैसे होगी आपकी लीला अपरमपार

फिलहाल रेलवे जनता को क़रीब 32 हज़ार करोड़ रुपये की रियायती सेवाएँ मुहैया करवाती है. इसमें से क़रीब 22 हज़ार करोड़ रुपये का घाटा सामान्य दर्ज़े और उप-नगरीय सेवाओं की वजह से है. दर्द ये कि एक तरफ़ ये भारी घाटा और दूसरी तरफ़ सातवें वेतन आयोग की सिफ़ारिशें सिर पर हैं. जो रेलवे पर 32 हज़ार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ने का संकेत देता है. अतः प्रश्न तो उठेंगे, भारतीय रेल का कायाकल्प करने में नरेन्द्र मोदी सरकार कितनी सफल साबित हुई है ? रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने पिछले रेल बजट में जो लक्ष्य रखे थे, उन्हें कितना हासिल कर पाये ? पिछले बजट के वक़्त बड़े दावे हुए अतः रेलवे की माली हालत में कितना सुधर हुआ ? आखिर रेलवे के भारी घाटे की वजह है क्या ? महीने भर बाद पेश होने वाले रेलवे बजट में इस बार यात्री भाड़े में भारी बढ़ोत्तरी होगी.
              ये आलम तब है जबकि डीज़ल का भाव बहुत निचले स्तर पर है. देश में रेलवे ही डीज़ल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है. दुसरी तरफ रेलवे के कुल राजस्व में माल भाड़ा की हिस्सेदारी 65 फ़ीसदी की है. लेकिन इसमें कोई ख़ास इज़ाफ़ा होने की अब गुंजाइश बची नहीं है क्योंकि माल भाड़ा पहले से ही अपने ऊँचे स्तर पर है. क्या इस लिए  इस बार रेल बजट में सामान्य दर्ज़े और महानगरीय सेवाओं के भाड़े को भी ख़ूब बढ़ाया जाएगा ?वह भी तब जब रेलवे के क़रीब 55 फ़ीसदी मुसाफ़िर इसी तबक़े के हैं.तो क्या रेल मंत्री सुरेश प्रभु के पास यात्री भाड़ा में फिर एक बार भारी बढ़ोत्तरी ही विकल्प है ?
                 चार्टड एकाउन्टेंट रहे साफ़-सुथरी छवि वाले सुरेश प्रभु को नवम्बर 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेल मंत्रालय की क़मान ये सोचकर सौंपी थी कि वो रेलवे में चमत्कार करके दिखाएँगे. मोदी को यक़ीन था कि प्रभु की अगुवाई में देश के सबसे बड़े ट्रांसपोर्टर भारतीय रेल के दिन फिर जाएँगे, लेकिन प्रभु की मौजूदगी के बावजूद ‘उम्मीद’ भारतीय रेल से ऐसी रूठी कि अच्छे दिन आज भी सपनों में ही दिखाई देते हैं.
                  प्रभु के बीते एक वर्षीय कार्यकाल का अध्यन माल ढ़ुलाई से करते हैं. प्रभु ने 7.7 फ़ीसदी वाला ज़बरदस्त विकास (Robust Growth) का लक्ष्य हेतु पिछले बजट में प्रभु ने माल ढुलाई के लक्ष्य को 111 करोड़ टन से बढ़ाकर 119.5 करोड़ टन पर ले जाने का लक्ष्य रखा था. लेकिन दिसम्बर तक रेलवे 81.65 करोड़ टन माल की ही ढुलाई कर सका. जबकि पिछले साल इसी अवधि में 80.85 करोड़ टन माल की ढुलाई हुई थी. यानी प्रभु के नेतृत्व में महज़ एक की मामूली वृद्धि. जबकि माल ढुलाई ही रेलवे का कमाऊ आधार है. इससे होने वाले मुनाफ़े से ही रेलवे उस घाटे की भरपायी करता है जो उसे रियायती सेवाओं को देने की वजह से होती है. रियायती सेवाएँ भी दो तरह की हैं. पहला, ग़रीब और कमज़ोर तबक़े से जुड़ा यात्री भाड़ा और दूसरा, आवश्यक वस्तुओं जैसे नमक, खाद वग़ैरह की ढुलाई पर लागू रियायती माला भाड़ा तथा 53 क़िस्म की विशेष यात्री रियायतें.याद रहे पिछले साल रेलवे ने 1423 करोड़ रुपये की ऐसी रियायतें दे राखी थीं. अब फल-सब्ज़ी जैसी आवश्यक वस्तुओं की रियायती ढुलाई से उसे 53 करोड़ रुपये का घाटा हुआ, तो वहीँ उप-नगरीय रेल सेवाओं से 4 हज़ार करोड़ रुपये और सामान्य दर्ज़े के मुसाफ़िरों से अभी क़रीब 18 हज़ार करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है. इस तरह, रेलवे को सरकारी ट्राँसपोर्टर होने के नाते जो जन सेवा दायित्व (Public Service Obligation) निभाने पड़ते हैं, उनकी वजह से उसे 32 हज़ार करोड़ रुपये का कुल घाटा होता है.
                            एक दूसरे पहलु रेलवे के संचालन व्यय की नज़र से देखा जाए तो पाएंगे कि रेलवे की एक और बड़ी समस्या उसके संचालन व्यय (Operating Ratio) को लेकर है. जो पिछले वर्ष 91.8 फ़ीसदी था तो वहीँ अक्टूबर 2015 में ये 97% पर आ पहुँची है. तो क्या रेलवे सौ रुपये का राजस्व कमाने में 97 रुपये ख़र्च कर रहा है ?  क्योंकि ख़ुद सुरेश प्रभु ने पिछले रेल बजट में इसे 88.5% पर पहुँचाने का लक्ष्य रखा था. संचालन व्यय का नाता रेलवे के उन अफ़सरों और कर्मचारियों से है, जो रेलवे के मौजूदा तंत्र को चला रहे हैं. जिनकी एक ही दलील होती है कि रेलवे के सस्ता होने और लागत के लगातार बढ़ते रहने की वजह से मुनाफ़ा नहीं हो रहा है. तो क्या अब मुनाफा कमाने हेतु अब लोगों से अधिक किराया लेना ही प्रभु का अगला कदम होगा ? जो रेलवे पर पड़ने वाले गहरे नकारात्मक संकट का संकेत है.
                                ध्यान देने की बात ये है कि प्रभु ने आरक्षण शुल्क और तत्काल सेवाओं को ख़ूब महँगा करके उसे यथासम्भव पहले ही निचोड़ लिया है. उच्च श्रेणी के यात्री भाड़े में ज़्यादा इज़ाफ़ा करने की गुंजाइश भी सुरेश प्रभु के पास है नहीं, क्योंकि ऐसा करते ही वो हवाई जहाज़ के किराये के क़रीब पहुँच जाएँगे. इससे उच्च श्रेणी के मुसाफ़िरों के घटने का संकट पैदा हो जाएगा. ज़ाहिर है, जो विकल्प अब बन सकता नहीं.
                                 अब बात यात्री सुविधाओं के विकास के लिए सुरेश प्रभु ने पिछले बजट में 1748 करोड़ रुपये का इन्तज़ाम किया था. लेकिन  रक़म ही 30% ख़र्च हो पायी है. तो क्या 31 मार्च यानी मौजूदा वित्त वर्ष तक बाक़ी रक़म ख़र्च हो नहीं सकेगी पाये. कुछ यही आलम ‘रेल पटरियों के दोहरीकरण’ की योजना का है. जिस का कुल बजट में से अभी तक सिर्फ़ 41% ही प्रयोग हो पाया है. अन्य पूँजीगत ख़र्चों (Capital Expenditure) के मोर्चे पर भी अभी तक 44% रक़म ही खर्च हो सकी है. अब प्रश्न तो उठेगा ही कि रेलवे ने नये निर्माण के लिए जिन अफ़सरों और कर्मचारियों को नौकरी पर रखा है, उनका प्रदर्शन कैसा है ?
                            उच्च श्रेणी और हवाई जहाज़ के किराये में अधिक अंतर रहा नहीं तो क्या प्रभु अब सामान्य भाड़ा और बस किराया की तुलना में रास्ता तलाशेंगे. मसलन,  दिल्ली से चंडीगढ़ की 266 किलोमीटर की दूरी के लिए बस का किराया जहाँ 350 रुपये है, वहीं सामान्य दर्ज़े के लिए रेल किराया सिर्फ़ 95 रुपये है. इसी तरह, दिल्ली-आगरा की दूरी है 194 किलोमीटर. सामान्य दर्ज़े का रेल किराया है 85 रुपये. जबकि बस का किराया 280 रुपये. अगर इन बिन्दुओं पर नज़र रखते हुए प्रभु का कदम उठता है तो समझ लीजिये कि अब इस वर्ग के मुसाफ़िरों से ही पैसे जुटाने की सम्भावना दिख रही है, जो नकारात्मक संदेश तो देगा ही, क्यों कि आज भी रेल यात्री के रूप में भारत का एक भारत रेल में ही बस्ता है.
                  अब  रेल मंत्री चाहते हैं कि वित्त मंत्री अरूण जेटली रेल घाटे की भरपायी में सहयोग दें. लेकिन जेटली का कहना है कि जन सेवा दायित्व की कोई सरकारी परिभाषा तय नहीं है. लिहाज़ा, पहले इसे किसी स्वतंत्र संस्था से परिभाषित करवाना चाहिए. सुरेश प्रभु इसके लिए राज़ी हैं. लेकिन प्रभु का कहना है कि इस काम को सम्बन्धित मंत्रालयों (Inter Ministerial) की समिति से करवाया जा सकता है, जो ये भी तय करे कि ऐसी रियायती सेवाओं से रेलवे को कितने राजस्व का नुक़सान होता है? कुल मिला कर बात यहीं अटकी है. इधर मज़े की बात ये है कि सुरेश प्रभु ने पिछले बजट में एक लाख करोड़ रुपये की युगान्तरकारी योजना बनायी थी. योजना का आकार ऐतिहासिक था. तब वित्त मंत्रालय ने रेलवे को 12 हज़ार करोड़ रुपये की बजटीय सहायता देने के वादा किया था. लेकिन जब दिसम्बर तक प्रभु सिर्फ़ 40 हज़ार करोड़ रुपये ही ख़र्च कर पाये तो वित्त मंत्रालय ने ये कहते हुए अपनी सहायता वापस ले ली कि रेलवे इसका इस्तेमाल नहीं कर पाएगा.
रेलवे ने निवेश जुटाने के लिए भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के साथ भी एक क़रार किया था, जिसके तहत LIC ने पाँच साल के लिए रेलवे को 1.5 लाख करोड़ रुपये मुहैया करवाने का वादा किया है. लेकिन रेलवे के पास तो खुद के गुज़ारे के लिए पैसे नहीं जुट रहे, वो LIC से कर्ज़ लेकर महँगा ब्याज़ कैसे भरेगा. तो क्या सुरेश प्रभु का रिपोर्ट कार्ड इतना बता रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें लेकर जो सब्ज़बाग़ देखे थे, उन पर पानी फिरता जा रहा है ?