फसल किसी ने लगाई, उजाड़ा किसी और ने, भुगतभोगी जनता बनी, आखिर क्यों ?

                             ऊपजाऊ खेतों से हट कर रास्ते से पहले की बंजर ज़मीन पर ज़मींदार साहब की नज़र तब भी नहीं पड़ती थी जब वह घोड़े पर सवार धुल उड़ाते प्रतिदिन अपने खेतों की सैर करते हैं। इस बात का इल्म होते ही गरीबवा नामक बेघर अपने परिवार के लिए घास फूस का आशियाना लेता है । झोपड़ी नुमा फसल उगती चली जाती है, इन्तहा तो तब हो जाती है जब उन्हें वोटर कार्ड, बीपिएल  कार्ड  जैसे दस्तावेज़ किसी नेता जी के वोटों हेतु सौदे से भरी रहमत से मिल जाती है। अपनी खुली आँखों से खेतों के दीदार करनेवाले ज़मींदार की नींद अचानक तब टूटती है जब उसे कच्ची बस्ती से सज चुकी बंज़र ज़मीन की याद आती है, उस पर हक़ जमाते हुए उसे उजड़ने में उसे कोई संकोच नहीं होता है।
                        प्रश्न उठता है की कुसूरवार कौन हैं, बस्ती बसने वाल्व गरीब, ज़मींदार या फिर वोटर कार्ड बाँटने वाले नेता जी ? यहाँ कच्ची बस्ती से तात्पर्य शकुरबस्ती का है, ज़मींदार का मतलब हमारी गैरजिम्मेदार सरकार तो वोटर कार्ड बांटने वाले नेता से मतलब  है वोट बैंक की राजनीती करनेवाले दल।
                         गैर कानूनी, कष्टजनक शकुरबस्ती जैसी बस्तियों की गिनती कितनी हैं गिनना जितना मुश्किल है उतना ही जितनी इनके उजड़ने पर सधने वाली सियासत की चली आरही पुरानी परम्परा ।
                      जी हाँ मसला शकूर बस्ती का है ये वही बस्ती है जिसने १५ वर्ष पूर्व अपने पैर रेलवे लाइन के किनारे ज़माने शरू किये थे । केंद्र की मोदी सरकार के रेल मंत्रालय ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार के दो आला अधिकारियों की देख रेख में शकूर बस्ती को उजाड़ने हेतु बरसों से चली आरही पुरानी परम्परा निभाया । त्रिकोण मसले की पहली दिशा अगर मोदी सरकार है तो दुसरी केजरीवाल सरकार है लेकिन तीसरे यानी कांग्रेस का ज़िक्र भी ज़रूरी है, असल में १५ वर्षों पूर्व जब शकूर बस्ती की शरुआत हुई तब उस दौर में कांग्रेस का ही दिल्ली शासन था। लेकिन आज की घटना में कांग्रेस न तीन में है न तरह में है, इस लिए उसे आप और भाजपा पर हमला करने का आसान मौक़ा मिल गया है । लेकिन कांग्रेस भी कम ज़िम्मेदार नहीं, उससे पूछने की ज़रूरत है कि कच्ची बस्ती के बुनियाद के समय कांग्रेस ने आँखें क्यों मूँदें रखीं, जो आगे चल कर गरीब तबकों के लिए नासूर बन जाती हैं ?
खैर, घटना के तुरंत बाद मानवीय संवेदना का मनो काउंटर खुल गया हो, एक के बाद एक बुकिंग हेतु नेता घटना स्थल पर पहुँच मानवी संवेदना की दुहाई देते हुए घटना के खिलाफ 100 में 100 अंक अर्जित करने की होड़ में लग गए।
इस होड़ में शामिल दिल्ली के मुख्यमंत्री ने अपने दो अफसरों को बर्खास्त करने का आदेश जनता के बीच ही सुना दिया । उधर मासूम की मौत पर हायतौबा शरू हुई तो रेल मंत्री ने अपना पल्ला झाड़ते हुए नियम कानून के मुताबिक़ जाएज़ बताया, लेकिन स्थिति को भांपते हुए संसद के अपने बयान में कहा ” भविष्य में कच्ची बस्तियां मानवता के आधार पर खाली कराइ जाएंगी ” उन्हों ने आगे कहा कि ” केजरीवाल सरकार से बात करने के बाद “, तब तो ये टिप्पड़ी शकुरबस्ती की बीती घटना के आधार पर सरकार के गैरजिम्मेदाराना रवैये पर कई सवाल भी खड़े करती है ।
न्यायपालिका की नज़र से देखें तो दो ख़ास टिप्पड़ियों पर ध्यान दिलाना चाहूंगा, पहला सुप्रीम कोर्ट आदेश, जिस के अनुसार ‘ २००६ से पहले की बसी हुई कच्ची बस्तियों पर बुलडोज़र नहीं चलाया जा सकता, पहले पुनर्वास की वेवस्था हो उसके बाद ही झुग्गी झोपड़ी हटाई जा सकती हैं’ । दूसरा , हाई कोर्ट का आदेश ‘ अचानक बुलडोज़र देख लोगों में दहशत फ़ैल जाती है, लोग बदहवास हो जाते हैं, अफरातफरी का माहोल बन जाता है’ । कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने तो बस्ती खाली करने के लिए २ महीने का वक़्त देने की बात कही।
रेल मंत्रालय कहता है कि इस साल दो बार नोटिस भेजी जचकी है, इस लिए पुनर्वास की ज़िम्मेदारी दिल्ली सरकार की बंटी है, इसके जवाब में दिल्ली सरकार ने किसी भी नोटिस मिलने से इंकार कर दिया ।
लेकिन ऐसे मामलों में मानवीय संवेदनाओं के बहुत उदाहरण हैं नहीं, फिर भी २००२ की राजस्थान विश्व विद्यालय से कच्ची बस्तियों के हटाए जाने से पहले पुनर्वास उपलब्ध कराने का मामला मानवीय संवेदना की बड़ी मिसाल पेश करता है। खास बात ये है कि वह दौर गहलोत सरकार का था। पुनर्वास हेतु जयपुर आगरा हाईवे के नज़दीक पालड़ी मीड़ा गाँव में सरकारी ज़मीन को समतल करा रहने योग्य बना उपलब्ध कराया गया । यही नहीं जयपुर विकास प्राधिकरण के ट्रकों से बस्तीवासियों के सामान पालड़ी मीड़ा गाँव पहुँचाया गया था तो वहीँ दसवीं की परीक्षा दे रहे छात्रों के लिए मिनी बस की उपलब्धता भी सरकार ने ही कराया था।