बसपा बहुमत के करीब पहुँचती दिखाई देरही है !

देशवासी बखूबी वाकिफ हैं की 543 लोकसभा सीटों की राजनितिक जमीन हेतु उत्तरप्रदेश की 403 विधान सभा सीटों का महत्त्व आखिर है क्या ? क्या वाकई उत्तरप्रदेश की फतह भविष्य में केंद्र की सत्ता प्राप्त करने हेतु बुनियादी ज़मीन तैयार करती है ? दो राष्ट्रिय पार्टी में कांग्रेस क्यों कई दशक से वजूद की तलाश तो वहीं युपी में अबतक बहुमतहीन रही भाजपा ठौर की तालऐश में संघर्षरत है ? क्या बसपा सपा जैसे क्षेत्रीय दलों के प्रभाव ने यूपी को हाईजैक करते हुए भाजपा और कोंग्रेस को केंद्र तक सीमित कर दिया है या फिर ये राष्ट्रिय दल सीमित होने को मजबूर हो गए हैं ? 2012 में यूपीए के प्रति उपजे अविश्वास की तरह 15 लाख…., ये तो एक जुमला था…. नोटबंदी ….आदि के कारण भाजपा के प्रति उपजे अविश्वास का असर 2017 के विधान सभा चुनाव में भाजपा के लिए सर दर्द बनने वाला है ? पिछले कई दशकों का इतिहास गवाह है कि राष्ट्रिय दलों कि तुलना में यूपी की जनता सपा और बसपा पर क्यों विश्वास जताती आई है ? इन सब तथ्यों के आधार पर २१०७ चुनाव के अंतिम दौर में यूपी के मूड को परखते हैं ?

वाकई ! उत्तरप्रदेश की जनता मानो कई दशकों से सत्ता एवं विपक्ष हेतु सपा और बसपा के लिए ओसरी तय कर रखा है. ये इत्तेफ़ाक़ नहीं इसकी वजह भी है. सत्ता का मिलना और सत्ता से विपक्ष का सफर तय करना सिर्फ मुद्दों पर निर्भर करता है. बस यही दुखती नब्ज़ है राजनीति की, इसी कारण कभी हाशिमपुरा केस के बाद आजतक कांग्रेस जनता दल के उदय के साथ यूपी वापसी कर नहीं पाई. तो वहीं लहरों का सहारा ढूंढने वाली भाजपा यूपी में कभी पूर्ण बहुमत के दर्शन कर नहीं पाई. बात भी सही है लहर कभी कभी उठती है. तो वहीं सुनामी विरले ही स्थापित होती है. जैसे एक बार राम मंदिर के मुद्दे ने भाजपा को UP में  १७७ सीटें नसीब करवाईं लेकिन पूर्ण बहुमत भाजपा से रूठी रही. तो वहीं मोदी लहार ने यूपी की ८० लोकसभा सीटों में 71 सीटें भाजपा की झोली में डालने के लिए जिम्मेदार बनीं, परिणामस्वरुप भाजपा को उसके १५% से लगभग तीन गुना यानी ४२.३०% वोटों का तोहफा नसीब होगया .

लेकिन लहर तो लहर है धरातल नहीं, धरातल आधार से बनता है और आधार कर्तव्य से. रही बात कर्तव्य की, इसकी शिक्षा मोदी जीने पूर्व प्रधान मंत्री माननीय अटल जी से गुजरात दंगे के पश्चात् ले लिया है, जब माननीय अटल जी ने ‘राजधर्म’ निभाने की बात कही थी. बात भी सही है संवैधानिक  पद का कर्तव्य राजधर्म निभाने से ही सिद्ध होता है. लेकिन, ये प्रजातंत्र है और इसके ठेकेदार अक्सर इसे दरकिनार करने से बाज़ नहीं आते हैं. अब जब राजधर्म की बात आरम्भ हो ही गई है तो समझ लीजिये न ही यूपी की राज्य सरकार और न तो केंद्र सरकार राजधर्म निभाने के करीब पहुँच सकी. याद कीजिये २०१४ लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी जी के द्वारा कहा गया १५, १५ लाख…….. वाले जुमले को जो आधारहीन था. लेकिन, इस आधारहीन जुमले ने फ्लोटिंग वोटर के बीच यूपी में ऐसा आधार बनाया की भाजपा ने १५% ( २०१२ विधान सभा चुनाव) की तुलना में ४२% की लगभग तीन गुना ऊंची छलांग प्राप्त की. मगर ऊंचाई का सफर तय कर चूका ग्राफ नीचे तब आया जब अमित शाह जी ने १५,१५ लाख…… को जुमला करार दिया. बस यहीं से समझ लीजिये कि भाजपा अब अपने स्वाभाविक वोट १५% के करीब खड़ी दिखाई दे रही है. लेकिन, २०१४ में हासिल किये गए फ्लोटिंग वोटर के कुछ हिस्से पर आज भी मोदी जी का जादू बरक़रार है. जिन्हें जोड़ने के बाद समझ लीजिये भाजपा उत्तरप्रदेश में १८% के आस पास खड़ी है. जो भाजपा द्वारा सरकार बनाने के संकेत से कोसों दूर है.
आरम्भ कांग्रेस से किया था लेकिन, कांग्रेस को परिभाषित करना अभी बाक़ी है, इतिहास पर नज़र डालिये तो महसूस होगा कि कोंग्रेस का हाल आज औरंगज़ेब के बाद के मुगल वंश काल की तरह हो गया है. जिसे सिर्फ बैसाखी की तलाश रहती है, आज के परिदृश्य में सपा ने खुद को कांग्रेस की बैसाखी बनाया है लेकिन बैसाखी के सहारे कांग्रेस कितनी ऊँची उड़ान ले सकती है ? प्रश्न जाएज़ है, कांग्रेस ने २०१२ विधान सभा चुनाव में १०% वोट हासिल किये जो २०१४ लोकसभा चुनाव में घटते हुए ७.५% पर खिसक गया. यानी २.५% की गिरावट. ये फ्लोटिंग वोटर हैं. जिनकी वापसी कांग्रेस खेमे में होनी तय है. लेकिन, छोटी बहन सपा का साथ मिलने के बाद कांग्रेस का वोट % बढ़ेगा , पर कोई लहर तो है नहीं, अतः बहुत ज़्यादा फ़र्क़ पड़ेगा नहीं, जो सपा को सत्ता के करीब तब ही ला सकता है जब सपा खुद में हुए भितरघात , अंतरकलह एवं मुस्लिम वोटर को बनाये रख सकने की कसौटी पर खुद को साबित कर सके. सपा विकास के लाख दावे करे, बावजूद इसके मुस्लिम छोटे बड़े सैकड़ों दंगे पर सपा का जवाब चाहेंगे तो वहीं यूपी किसान पिछले ४ वर्षों में तहस नहस फसलों पर मिले कागज़ी मुआवज़े हेतु वोटों द्वारा ७ चरणों में जवाब देते आ रहे हैं. इन अवस्थाओं पर गौर कीजिये तो साफ़ प्रतीत होता है कि सपा ने जो वोट % २००७ में २७.६३ से बढ़ाया था वह २०१२ में 29.15% पर पहुंचा, लेकिन , यही वोट २०१४ में घट कर २२% पर जा पहुंचा, जो अब पुनरावस्था लेता प्रतीत हो नहीं रहा है. अतः अंकगणित पर गौर करें तो सपा + कांग्रेस मिल कर बहुत ज़्यादा तो २६ से 28% तक ही पहुंचती दिख रही है. इन अवस्थाओं में हानि सपा को होप्ती प्रतीत हो रही है जबकि झटका भाजपा के खाते जाता दिखाई दे रहा है. लेकिन, लाभ की स्थिति में कांग्रेस तब है जब वोट % बढ़ने से 2019 के लिए कांग्रेस को टॉनिक की ज़रूरत पूरी होती दिख रही है.

भारत में सुशासन की परिभाषा देचुकी बसपा सुप्रीमो ने हर रैली में तर्क देते हुए जहाँ मुस्लिमों का ज़िक्र बार बार किया तो वहीं किसानों , दलितों की वकालत भी , तो दुसरी तरफ भविष्य में विकास कार्य हेतु वोट मांगे . लेकिन अंकगणित पर नज़र डालते ही पता चलता है कि किस तरह २००७ में बसपा ने ३०.४३% का जनाधार बनाया तो वहीं २०१२ में घाट कर २५.91% पर जा पहुंचा. लेकिन २०१४ लोकसभा चुनाव में बसपा के ये वोट % 19.60 पर आ खड़ा हुआ . यानी बसपा ने जो वोटर खो दिया था वह फ्लोटिंग वोटर हैं. लेकिन, मतदाताओं का मिजाज़ देखते हुए ये निष्कर्ष दिखाई दे रहा है कि 15,15 लाख ………किसानों को मुआवज़े ……यूपी सांप्रदायिक दंगे ……..नोटबंदी के कष्ट ……..यूपी का विवादित प्रशासन …..के दर्शन के बाद बसपा खेमे के वोटर वापसी करते दिखाई दे रहे हैं. इस बिना पर अगर बसपा ३० से ३२% का मत हासिल कर सरकार बनाती है तो कोई आश्चर्य नही . बसपा बहुमत के नज़दीक है, अगर कुछ उन्नीस बीस होता है तब RLD एवं कांग्रेस बसपा को साथ देने की इस्थिति में दिखाई दे रहीं हैं. जी वही कांग्रेस जो ३ पैर से दौड़ने लगी है.