बिहार विधानसभा चुनाव २०१५ क्या मूंछों के स्वाभिमान की लड़ाई है ???

बिहार विधान सभा चुनावों की तारीखों की घोषणा हो चुकी है, हर तरफ मूंछों पर दिए जारहे बल की ही चर्चा आम है. २४३ विधान सभा सीटों वाले राज्य बिहार में पूर्णबहुमत मिलता किसी भी पार्टी को दिख नहीं रहा. शायद इसी लिए दो राष्ट्रीय दलों में से एक कांग्रेस क्षेत्रीय दलों की शरण में है, वहीँ भाजपा क्षेत्रीय दलों को अपनी शरण में लेकर अपने अपने स्वाभिमान की लड़ाई का झंडा लेकर राज्यसभा में मौजूदगी बढ़ाना चाहते हैं.

याद कीजिए मध्यकाल के युद्धों को जब स्वाभिमान को केंद्र में रख कर सामंतों , जागीरदारों के बीच तनाव टकराव और जंगों का रूप लेलेते थे, परिणामस्वरुप नजाने आज तक कितनी जंगों का गवाह बना हैं भारत देश. लेकिन, उस दौर में जहाँ आत्मसम्मान का टकराव सिर्फ शक्तिवानों, सामंतों में दिखाई देता था, आज हालात जुदा होचुके हैं.उस दौर में अपने अपने वर्चस्व या साम्राज्य के विकास के लिए टकराव होता था, लेकिन, आज स्वाभिमान डेमोक्रेसी से परिभाषित होकर जहाँ आत्मसम्मान को जगाता हैं वहीँ इज़्ज़त की चाह उपजता हैं, शायद इसी लिए स्वाभिमान अब दलितों, पिछड़ों और उपेक्छितों में विकसित होरहा हैं.

इसकी सबसे बड़ी मिसाल बिहार है. चुनाव तारीखों के ऐलान के बाद तैयार मैदान और तेज़ चुनावी सरगर्मी हेतु बात भाजपा से आरम्भ करते हैं. भाजपा ने साफगोई से केंद्र में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद भी लोजपा सुप्रीमो को केंद्रीय मंत्री पद दिया, इस उम्मीद से की बिहार फतह करना है, तो भविष्य में पासवान भाजपा को दलित वोट अर्जित करवाने में सबसे बड़े सूत्रधार बनेंगे. तो दूसरी तरफ कुछ समय के मुख्यमंत्री मांझी ज्यों ज्यों जदयू से किनारा करते गए , समय की नब्ज़ को पढ़ने में माहिर भाजपा त्यों त्यों उनके क़रीब होती गई. यही नहीं भाजपा ने महांदलित को कैश कर सोशल इंजीनियरिंग के इकविलिब्रियम स्थापित करने की पहल २०१५ विधान सभा हेतु कर दी. जो कुछ भी घटा सब अपने अपने स्वाभिमान के विकास को ध्यान में रख कर घटता रहा. अब इन स्थितयों में भाजपा को मोदी से बेहतर चेहरा बिहार फतह के लिए मिलसकता नहीं, साथ ही अमित५ शाह की चनक्या नीति भी, लेकिन, मोदीजी ने जिस जादुई अंदाज़ में लोकसभा में एंट्री मारी वह जादू शायद आज उस चरम पर कायम नहीं है. लेकिन भाजपा को नितीश के बैर का जवाब अपने स्वाभिमान के लिए देना है. अब मोदी जी भी अपनी कही हुई बातों से वकिफ हैं, चाहे १५ लाख का अकाउंट में आना हो, काले धन का देश में वापस आना , नौकरियों की बढ़ लगना , न खाने देंगे न खाएंगे.., आदि बातें भाजपा के ठोस स्वाभिमान को ठेंस पहुंचाती हैं. शायद इसी लिए मोदी जी ने ऊँची जाती की गोलबंदी से लेकर मौजूदा सरकार की विरोधी लहर तक ही नहीं, दलित के लिए लोजपा, महांदलित के लिए मांझी एवं ओबीसी कार्ड के लिए कुशवाहा को रणनीति का हिस्सा बनाया. अब राजग ने स्वाभिमान के सम्मान की लड़ाई के लिए आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीती में बिहार के विकास को छोड़ सिर्फ जाती, धर्म , पिछड़े , पैकेज आदि को हथियार बनाया है.

दूसरी तरफ , महांगठबंधन का क़िला सपा सुप्रीमो मुलायम के कठोर कदम से जड़ से हिल गया है. मुलायम का उठाया गया ये कठोर कदम आधुनिक राजनीति में स्वाभिमान की लड़ाई की सबसे बड़ी मिसाल है. सुशासन बाबू की, स्वाभिमान की लड़ाई में वह सुशासन से विकास बाबू बनने की यात्रा पूरी नहीं कर पाए, वह अलग बात है की उसके कई कारण होंगे . नितीश और मोदी जी में शायद सबसे बड़ा फ़र्क़ यहीं है , की मोदी जी जिस अंदाज़ से नितीश पर ऊँगली उठाते, नितीश कहीं न कहीं थोड़े २० होकर उसका जवाब बिहार से जोड़कर देते हैं. याद कीजिए जब मोदी ने नितीश के DNA…..पर कुछ कहा, नितीश ने मौका भुना इसे बिहार के डीएनए से जोड़ दिया. राजनितिक वनवास झेल रहे राजद सुप्रीमों लालू ने भविष्य के स्वाभिमान की खातिर नितीश का साथ देना बेहतर समझा, अब दोनों की जुगलबंदी ने स्वाभिमान की राजनीति को विस्तार देने के लिए गावं, नगर शहर आदि से खून, नाख़ून, बाल आदि के सैम्पल भेजने का अभियान चलाकर नरेंद्र मोदी को जवाब देते हुए जनता तक संदेश दे रहे हैं की बिहारी अस्मिता और बिहारियों की बेइज़्ज़ती होरही है.
स्वभिमान की इस जंग में अगर ये कहा जाए की मोदी के अंदाज़े बयां ने नितीश और लालू को बिहारी अस्मिता -भाव को चुनवी मुद्दा बनाने का मौका दिया है, तो गलत न होगा, वैसे भी स्वाभिमान की राजनीति हमेशा अपमान को सामने रख कर सार्थक बनाई जाती रही है.