भारतीय मुसलमानो के कितने क़रीब है आज़म और ओवैसी ???

बड़ा ही गहरा साया देश के अम्नो अमाँ की की जानिब हो चला है. जब से देश ने आज़ादी पाई है है, हर तरफ मुस्लिमो का हिमायती बनने की होड़ सी लगी है, जो लगातार बढ़ती जा रही है . देश के मुसलमानो ने सिर्फ बाते और भाषण सुनें तो वहीँ वादों की खोखली पृष्ठभूमि भी देखी, फिर भी समाज के इस तबके को कभी भी वह कीमत न हासिल होसकी , जिसका उसे हक़ था. सच कहे तो इन्हीं बातों, भाषण और वादों ने साम्प्रदायिकता का ज़हर अम्नो अमां की फ़िज़ा में घोला, जिसका दंश आज समाज भिन्न भिन्न रूपों में झेल रहा है.
शब्दों की दुनिया ने इंसानियत को खूब डसा, और साम्प्रदायिकता का ज़हर घुला समाज में, जिसने बार बार रूप धरा नरभक्षी का, उस नरभक्षी ने फिर ये नहीं देखा की सामने हिन्दू है या मुस्लिम है सभी ने अपना अपना कुछ न कुछ खोया कर . फिर तूफ़ान थमा , लेकिन फिर कुछ दिनों में वही तूफान आता रहा , कोहराम मचता रहा , और मानवता का खूब शिकार होता रहा , ये सिलसिला रुकता ही नहीं.
उत्तरप्रदेश के गावों में एक कहावत है कि ‘ आप तो ऊसर पे बैठे है तो कुछ भी बोल सकते है’, तात्पर्य ये है कि आज़म साहब हो या ओवैसी साहब हो दोनों ही तो ऊसर पे बैठे है, धर्म की ऐसी राजनीती खेली है कि उन्हें न हारने का डर है न कुछ खोने का, कुछ भी कह सकते है, समाज जज़्बाती उम्र जिसे टीनएज कहा जाता है दीवानी होजाती इनकी, जिस उम्र में अपने भविष्य को लेकर गंभीर होना चाहिए, उस उम्र में वह अपना समय इन नेताओ की हिमायत करने में ख़राब करते है, वही इन नेताओ को इसका खूब इल्म है की लोगो को क्या सुनाया जाए. लोग भी जज़्बात की भावुकता में रम जाते है.
आज, अगर मुसलमानो की % आबादी से तुलना की जाए तो देखिएगा कि मुसलमानो की संख्या ईट AIMS IIM जैसे संस्थानों में न के बराबर है तो वही UPSC जैसी परीक्षा तो बिरले ही पास कर पाते है मुस्लमान. एक कलाम साहब का ज़िक्र कर मुस्लमान अपनी भगीदारी नहीं साबित कर सकते , अगर बिरले से कोई मुस्लमान किसी अहम परीक्षा में उत्तीर्ण होता है या फिर किसी प्रशासनिक पद पे मुस्लमान दिखाई देता है, तो समझ लीजिए उसने अपनी मेहनत कि मिसाल पेश की नाकि इन नेताओ के भाषण का परिणाम . अब सवाल जाएज़ है कि अगर देश में न के बराबर मुस्लिमो की संख्या शिक्षा , प्रशासनिक सेवा में है भी तो इन आज़म साहब या ओवैसी जी जसो का इसमें कितना योगदान है ?????
आज तक इन्हो ने कितने टैलेंट को निखारा है ??? आज तक कितने मुसलमानो की उच्च शिक्षा का स्रोत ऐसे नेता बने है ??? इन सवाल का जवाब सिर्फ और सिर्फ न ही होगा.
वह अलग बात है कि देश में आज कुछ स्थानो पे मुसलमानो की माली हालत कुछ बेहतर है, इसके लिए बाजपाई जी ज़िम्मेदार है जिन्हो ने गल्फ देशो में नौकरी का जरिया मुसलमानो के लिए तलाशा . फिर भी पुरे मुल्क में मुस्लमान आज भी जस कि तस हालत में है जिनके पास न शिक्षा है न ही रोज़गार, आज़म साहब ने २०१२ विधान सभा के चुनाओ प्रचार के दौरान अपनी पार्टी के विज्ञापन में मुसलमानो को बुनकर बने रहने का ही ज़िक्र किया, उससे ऊपर उठ ऊँची शिक्षा दिलाने का ज़िक्र नहीं किया . कमोबेश ओवैसी जी का भी यही हल है, जो बीते कल से बहार निकलना ही नहीं चाहते है, बल्कि वही धुन कि मुसलमानो पे ये ज़ुल्म इस पार्टी ने किया तो उस पार्टी ने इंसाफ नहीं किया मुसलमानो के साथ, जैसे बखान कर मुसलमानो का भविष्य तो सुनहरा नहीं कर सकते है.
मुसलमानो को खुद ही समझना होगा की ये देश जहा भिन्न तहज़ीब का संगम है, वही भिन्न धर्मो का मिलन भी , तो ये देश सुख और शांति का सागर भी है . फिर इस देश में ऐसे नेताओ के जज़्बात में आने से अच्छा है कि देश के लिए iit ,iim, aims जैसे संस्थानों में जाने का रास्ता ढूंढे तो वही IAS IPS बनने का सपना देखे या दिखाए जो सीधे देश ही नहीं अपनी क़ौम, घर , मोहल्ला , शहर सभी की तरक़्क़ी का सुखद कारण बनेगा .