मालदा, पूर्णिया अगर देवबंदी बनाम बरेलवी का परिणाम है, तो वहीँ मुस्लिम वोट बैंक हेतु नकारात्मक राजनीति का हिस्सा भी !

                लोगों के बीच ताज़ा गुस्सा है कि दादरी के अख़लाक काँड को लेकर मर्माहत हुए लोगों को अब माल्दा और पूर्णिया के मुसलमानों की असहिष्णुता क्यों नहीं दिख रही? समाज की दुर्दशा पर, बढ़ती असहनशीलता पर, तुष्टिकरण और वोट बैंक की सियासत पर, अब संवेदनशील लोगों का गुस्सा क्यों नहीं फूट रहा? सम्मान वापसी करने वालों की जमात अब कहाँ ग़ायब है? लेकिन समाजवाद की ये ख़ासियत है कि यहाँ एक जैसी परिस्थितियों में भी एक जैसा परिणाम नहीं होता. यही वजह है कि तब सम्मान वापसी करने वालों से ख़ूब पूछा गया था कि ‘तब’ कहाँ थे? ‘उस वक़्त’ सम्मान क्यों नहीं लौटाया? इसी वक़्त क्यों? इस बात पर क्यों? अब कहाँ हैं वो आहत मुसलिम सेलेब्रिटी और प्रगतिशील लेखक-कलाकार और चित्रकार-पत्रकार?
कठमुल्ले और पोंगापन्थी तत्व हरेक धार्मिक समुदाय में हैं. कहीं इनका अनुपात और दबदबा कम है, तो कहीं ज़्यादा और कहीं बहुत ही ज़्यादा. भारत ही नहीं, दुनिया भर में मुसलिम समाज में कूढ़मग़ज़ लोगों की तादाद सबसे ज़्यादा है. उल्टा, दुनिया के तमाम मुसलिम देशों के मुक़ाबले भारतीय मुसलमानों में प्रगतिशील और उदारवादी तबक़ा सबसे बड़ा है. हालाँकि, ये भी अपनी जमात में बेहद अल्पसंख्यक स्थिति में है. लेकिन इससे भी बढ़कर अफ़सोसनाक बात ये है कि भारत में प्रगतिशील मुसलमानों ने अपने समाज को बदलने की बहुत मामूली कोशिश ही की है या नहीं की है. शायद इसी इसीलिए भारतीय मुसलमानों में जहाँ कठमुल्लों का दबदबा बहुत ज़्यादा है वहीँ उदारवादी और प्रगतिशील लोग हाशिये पर हैं.

                     सोचने की बात ये है कि बदलते दौर के साथ भारत के हिन्दू समाज में प्रगतिशील और सुधारवादी ताक़तों ने अपेक्षाकृत कहीं ज़्यादा व्यापक पैमाने पर उदारवादी चिन्तन को सीखा और अपनाया है. लेकिन, तुलनात्मक दृष्टी से देखा जाए तो हिन्दुओं ने अब तक सुधारवादी परीक्षाओं में सौ में से पचास अंक हासिल किये हैं तो मुसलिम समाज बमुश्किल 10-15 अंक ही हासिल कर पाया है. अंकों का यही फ़ासला बहुसंख्यकों हिन्दुओं को अख़रता है. यही नये-नये द्वन्दों को जन्म देता है. इसीलिए माल्दा और पूर्णिया के घटनाक्रम को लेकर उस हिन्दू समाज में बहुत गुस्सा है, जिसने सिरफ़िरे कमलेश तिवारी को जेल में डाले जाने का कोई विरोध नहीं किया. जिसने उसके विचारों से सहमति नहीं जतायी. यहाँ तक कि हिन्दू महासभा जैसे संगठन ने भी उसकी निन्दा की. किसी ने उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई को ग़लत नहीं बताया.ऐसे में माल्दा और पूर्णिया के उपद्रवी मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए कैसे कमलेश को सज़ा-ए-मौत दी जा सकती है? वो भी क़ानूनी प्रक्रिया को पूरा किये बग़ैर ! तो फिर ये विरोध क्यों हैं?
अब प्रश्न उठता है की ऐसा हो क्यों रहा है, शायद जवाब दो हों, पहला ये कि बहुत सारे लोगों को ये पता नहीं है कि पैगंबर मोहम्मद को लेकर भद्दी टिप्पणी करने वाले सिरफिरे कमलेश तिवारी को जेल में डाल दिये जाने के बावजूद हज़ारों-हज़ार मुसलमान क्यों अलग-अलग जगहों पर हिंसक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं? ये मुसलमानों के भीतरी समुदायों के बीच धार्मिक वर्चस्व हासिल करने की जद्दोज़हद है जो कमलेश तिवारी का सिर माँगने की आड़ में सड़कों पर हिंसक कोहराम फ़ैलाकर अपना दमख़म दिखाना चाहता है. इसीलिए ये समझना बहुत दिलचस्प है कि आख़िर ऐसे दिखावटी विरोध प्रदर्शन की असली वजह क्या है? माल्दा, पूर्णिया या देश के अन्य कोनों से उठ रहे इन शोलों का सबब क्या है? समझना ये भी ज़रूरी है कि योगी आदित्य नाथ, साध्वी निरंजना, साक्षी जी महाराज आदि क्यों इतनी आसानी ने सांसद बन गए, कमलेश तिवारी के तरह ही ये लोग भी कभी उलटे सीधे बयान देते थे, मुस्लमान सिर्फ भावुक होसकते हैं मुस्लिमों की भावुकता ने इन लोगों को हीरो बना दिया है,फिर होने वाली राजनीति ने नेता और चाहने वालों ने मंत्री. अगर कल को कमलेश तिवारी भी विधायक या फिर मंत्री बन जाता है तो कोई ताज्जुब नहीं. होगा, शरय तो मुसलमानों को जाएगा जो उन्होंने बेनाम को विश्व में पहचान दिला दी.
उपरोक्त बातें जहाँ एक तरफ कमलेश तिवारी पर हुए बवाल, दरअसल देवबंदी बनाम बरेलवी की लड़ाई के बीच इशारा करती हैं, तो वहीँ पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर बिछ रही बिसात की तरफ भी इशारा करती हैं.पश्चिम बंगाल के मुस्लिम समुदाय जहाँ एक तरफ जागरूकता की कमी से नकारात्मक राजनीति की कमी के शिकार हो सकते हैं वहीँ इनकी बड़ी वोट बैंक कहीं न कहीं ऐसी राजनीति की शिकार हो सत्ता हथियाने का सबसे बड़ा हथियार बनसकती है.
मुसलिम समाज में जैसी धार्मिक एकजुटता है, उसे देखते हुए ज़रा कल्पना कीजिए कि यदि जुम्मे की नमाज़ के पहले होने बयान में सुधारवादी बातों का संचार होने लगे, अंदाज़ह नहीं लगा सकते कि कितनी तेज़ी से बदलाव आने लगेगा! लेकिन वहाँ तो असली समस्या ही धार्मिक नेताओं में है. राजनीतिक नेताओं की ग़ैरमौज़ूदगी में है. प्रगतिशील परिवारिक नेतृत्व की अनुपस्थिति में है. वहाँ समझदार लोग उतनी शिद्दत से अपने ही कुनबे के नासमझ लोगों को बदलने के लिए आगे नहीं आते, जितना अपेक्षित है. समस्याएँ हिन्दुओं में भी कोई कम नहीं थीं. लेकिन इसके ख़िलाफ़ कबीर, रविदास, नानक, राजा राम मोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानन्द, ज्योतिबा फुले और बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने जो अलख़ जगायी वैसा काम मुसलिम समाज में अभी तक हो नहीं पाया!
मुसलिम समाज तो मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद, ज़ाकिर हुसैन और फ़ख़रुद्दीन अली अहमद को भी अपना नायक नहीं बना सका. ये प्रगतिशील नेता न सिर्फ़ मोहम्मद अली ज़िन्ना जैसे दकियानूसों के आगे बौने पड़ गये. बल्कि इन्होंने सैयद शहाबुद्दीन और एपीजे अब्दुल कलाम जैसे लोगों को भी अपने समाज का नेतृत्व नहीं माना. ज़्यादातर मुसलमानों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वो अपनी धार्मिक पहचान के अलावा कुछ और देख ही नहीं पाते. उनका धार्मिक नेतृत्व उन्हें कुछ और देखने भी नहीं देता. वहाँ का प्रगतिशील वर्ग उन लोगों की ग़ालियाँ खाने के लिए आगे नहीं आना चाहता, जो भटके हुए हैं. जब तक मुसलमान ये नहीं समझेंगे कि उनके धार्मिक नेता कभी उनका भला नहीं कर पाएँगे, तब तक वहाँ किसी बड़े बदलाव की उम्मीद करना बेमानी होगा.