वाजिब डर किसका .. मंडल या फिर कमंडल का ….??????????

कमंडल के खेवनहार यानि प्रधानमंत्री अब तक की भाजपा आयोजित रैलियों में जिस अंदाज़ से ज से जंगल राज , ज से ज़हर ….. और ज से जेल … का डर दिखाकर बिहार जीतना चाहते हैं वह उस प्रतीक्षित महत्वाकांक्षा की ओर इशारे करता है जो अबतक के फेल मंसूबों को पास करने हेतु राज्यसभा में अपनी गणित सुधारने की कड़ी है. शायद इसी लिए डरा कमंडल भी है .

तो वहीँ मंडल का डर भी कम नहीं. मंडल के खेवनहार लालूजी का दर्द भी डर के लिए वाजिब है. हो भी क्यों नहीं ??? ज़माने हो गए राजद सुप्रीमों को सत्ता से दूर वनवास काटते हुए , इसीलिए एक सफल वापसी की बहुप्रतीक्षित महत्वकांक्षा हेतु या फिर अस्तित्व पर मंडराते खतरों के बादल को भांप कर छोटे भाई नितीश को साथ लेना उसी डर की ओर इशारे करता है.

डर की इस श्रृंखला की अगली कड़ी का अनुभव गठबंधन के नायक सुशासन बाबू अर्थात नितीश कुमार भी महसूस कर रहे है . शायद इसी लिए भुत काल में लालू राज के अंत हेतु भाजपा से गठबंधन किया , यही नहीं अपने भविष्य के खतरे को भांप भाजपा को छोड़ अपनी गठबंधन की महारत का इस्तेमाल कर लालू के साथ मंडल का फूल खिलाने निकल पड़े हैं.

अब इस डर की डोर सिर्फ मंडल या कमंडल तक सीमित नहीं . असल में कांग्रेस अपने पिछले हश्र से उसी प्रकार डरी है जिस प्रकार कभी लोजपा , अब जहाँ कांग्रेस ने नितीश को साथ देने का वादा किया है वहीं लोजपा ने खुद को पहले ही भाजपा सहयोगी घोषित कर पूर्ण बहुमत वाली भाजपा से मंत्रालय प्राप्त कर लोजपा प्रमुख ने स्वम् को भविष्य के लिए सींचने का काम कर रहे है .
अब मुश्किल तो भाजपा की और बढ़ी है. भाजपा भी जानती है एक म्यान में एक साथ दो तलवार हो नहीं सकतीं . हालात ऐसे आ बने है कि मांझी, राम बिलास पासवान या फिर कुशवाहा किसे बिहार का खेवन हार बनाएं , सुशील मोदी ने जितनी ईमानदारी से भाजपा की सेवा कि है , अब भाजपा दिल्ली कि तरह कोई किरण बेदी को ला खड़ा करने का साहस दिखा नहीं सकती, वरना पार्टी में भितरघात को मोदी अमित शाह की जुगलबंदी भी रोक नही सकती . , लेकिन सुशील मोदी को मुख्यमंत्री उमीदवार घोषित कर नहीं सकती, वरना मांझी और कुशवाहा की बग़ावत झेलनी पड़ेगी. अब मांझी जिन्होंने हाल ही में सत्ता सुख प्राप्त किया था, उन्हें कहीं न कहीं सत्ता में वापसी चाहिए. रही बात कुशवाहा जी की तो वह भी सत्ता सुख की ही महत्वाकांक्षा लिए भाजपा का दामन थामे आगे बढ़ रहे हैं, राम बिलास दोनों हाथों से लड्डू खाने में बिलकुल नहीं हिचकेंगे , एक तरफ केंद्र तो दूसरी तरफ बिहार आने वाले उनके सुनहरे भविष्य के लिए दोनों ही आवश्यक हैं.
इन हालातों में दोनों खेमों की पार्टी और उनकी सहयोगी पार्टियां अपने अपने पत्ते चुनाओ परिणाम के बाद ही खोलेंगी . ये डर का ही असर है की नितीश कुमार को लालू ने कांग्रेस के साथ स्वीकार कर लिया है लेकिन, भाजपा चुनाव पूर्व बिलकुल ही पत्ते खोलने की स्थिति में नहीं. हो सकता है की चुनाव परिणाम के बाद सहयोगियों की स्वाभाविक अदला बदली देखने को मिले , प्रमुख कारण किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलना मुख्य है, वह अलग बात है कि गठबंधन मेजोरिटी के क़रीब पहुंचे और चुनावी क्लीमेक्स में गठबंधन दलों कि अदला बदली होने पर मजबूर हो जाए. ये स्थिति NDA और महानगठबंधन दोनों पर लागु होती दिखेंगी . शायद उस वक़्त छोटे दल किसी को कड़ुवा घूंट पीने को मजबूर कर दें तो वहीँ किसी के लिए वरदान साबित हों. डर तो डर है, फिर डर किसका वाजिब है मंडल या फिर कमंडल का ………??????????????