ISIS जैसे आसामाजिक संगठनों के सच के अर्थ क्या हैं ???

ज़रा सोचिये कि आप अपनी कार से कहीं जा रहे हैं, फ्रेश होने के लिए आप किसी ढाबे पर रुकते हैं, अचानक आपकी कार कुछ क्रिमनल के हाथों हाइजैक हो जाती है, अब एक के बाद एक कई वारदात घटती चली जाती हैं, कार के नमबर को आधार बना पुलिस कार के मालिक को कुसूरवार मान ढूंढ रही हो, अब आप को साबित करना पड़ेगा कि कार आप की ज़रूर है लेकिन, वारदात गाड़ी हाइजैक होने के बाद हुई,और वारदात को हाइजैक करने वालों ने अंजाम दिया हो.
आज के मुसलमानों की हालत उस कार के मालिक जैसी है, कार का तात्पर्य इस्लाम धर्म से है, हाइजैक करनेवालों का अर्थ है आज के आसामाजिक  isis जैसे संगठन हैं, विश्व के सम्पूर्ण मुसलमानों को सामने आना होगा और ऐसे संगठनों से इस्लाम को आज़ाद करा ये साबित करना होगा कि मुस्लमान भाईचारे का पर्यावाची है न कि दहशतगर्दी का.

                  १० अगस्त १९९७ में ‘अबु निदान’ नमक ऑर्गनाइज़ेशन की निशानदेही के बाद अबतक कुल ५८ और ऑर्गनाइज़ेशनों को आतंकी संगठन के रूप में “US डिपार्टमेंट ऑफ़ स्टेट” ने चिन्हित किया . प्रश्न ये उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में इन अनचाहे संगठनों का जन्म पिछले १८ वर्षों में इतनी तेज़ी में हुआ कैसे ? आज की तारिख में बताया जाता है कि हज़ारों की तादाद में टीनएजर दुनिया भर से ISIS  जैसे असामाजिक संगठनों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं, आखिर क्यों ?
                    अधिकांश संगठन खुद को मुस्लिमों का सबसे बड़ा हमदर्द जताते हैं, प्रश्न ये उठता है कि सच्चा मुस्लमान जिस क़ुरान पाक को अपनी इबादत का जरिया मानता है, उसी में लिखा है कि “ऐ मुसलमानो अगर तुम किसी दूसरे मज़हब के लोगों को अपने मज़हब में शामिल करना चाहते हो तो  उसे दावत दो, अगर वह नहीं मानता तो उसपर दबाव देकर धर्म परिवर्तन कराने की कभी सोचो भी मत, वह भी खुदा की मख्लूक़ हैं, वह तुम्हारा मज़हब न क़ुबूल करे तब भी तुम उन के साथ बिना नफरत प्यार एवं भाईचारे के साथ जीवन व्यतीत  करो, याद रखो इस्लाम में नफरत और दहशत के लिए कोई जगह नहीं है.” जब क़ुरान ऐसा कहती है तब इन दहशतगर्दों को मुस्लमान नहीं माना जासकता, अतः ये कैसी हमदर्दी है कि इनकी घटिया हरकतों से इस्लाम बदनाम हो रहा है, इनकी बर्बरता का ही परिणाम है कि मुस्लिम मुल्कों में बेकुसूर सच्चे मुस्लमान दोतर्फी दहशत में जीने को मजबूर हैं, यहाँ दोतरफा दहशत का अर्थ है कि एक तरफ ISIS जैसों की दहशत तो दुसरी तरफ अमेरिका, यूरोपीय देशों के हमले से अनचाही दहशत. सच तो ये है कि पहले अफगानिस्तान फिर इराक, लीबिया, सीरिया जैसे मुल्क हर दिन फ्रांस की १४ नवम्बर जैसी दहशत को जीते आरहे हैं .
                 जी-२० शिखर सम्मेलन पर्यावरण और आर्थिक सहयोग के मुद्दे पर होना तय था. लेकिन, लेकिन सम्मेलन से एक दिन पूर्व पेरिस हमले के दर्द ने जी-२० शिखर सम्मेलन को आतंकवाद पर चर्चा करने के लिए मजबूर केर दिया. इस दौरान निष्कर्ष भी निकला कि विश्व में आर्थिक विकास चाहिए तो आतंकवाद को जड़ से कुचलने को ही पहली प्राथमिकता स्वीकारना होगा. लेकिन ये इतना आसान नहीं, क्योंकि ISIS जैसे जाहिलों का जन्म G-20 में शामिल कुछ मुल्कों की अति महत्वकांक्षा का ही परिणाम होसकता है. चलिए अफगानिस्तान पर हुए हमलों को जाएज़ मान लिया जाए, तो सवाल उठता है कि इराक पर हुए हमलों का परिणाम कहीं ISIS जैसे आसामाजिक संगठनों का जन्म तो नहीं ? कहीं सच ये तो नहीं कि विभिन्न देशों के अलग अलग हित आतंकियों के खिलाफ जारी लड़ाई के आड़े आरहे हैं ?
                               सच तो ये है कि फ़्रांस जैसे मुल्कों ने अन्य दूसरे मुल्क जैसे भारत  में हुईं पूर्व ऐसी दर्दनाक घटनाओं को कभी आतंकी घटना माना ही नहीं. याद कीजिये दाऊद जैसों ने आम भारतियों को कैसे दहलाया, क्या इन आम भारतियों में मुस्लमान नहीं दहले थे ? भारत के दर्द को कभी न समझने वाले यूरोपीय मुल्कों ने पाकिस्तान समर्पित आतंकवाद को दो देशों का आपसी मामला बता अपना अपना पलड़ा झाड़  लिया था, अब जब फ्रांस पर हमला हुआ है तो फ्रांस कहता है आतंकी हमला है, अब क्यों ? क्या ये विडंबना नहीं कि फ्रांस में घटित आतंकी घटना के बाद राष्ट्रपति ओलांद ने अपने देश के इतिहास के अबतक के इस सबसे भयावह हमले को युद्ध कृत्य करार देते हुए ये संकल्प लिया कि फ़्रांस IS पर बिना किसी दया के जवाबी कार्रवाई करेगा. लेकिन, पश्चिम एशिया के विशेषज्ञ रहे कोड़ेसमैन का कहना है कि IS पर बमबारी करने के लिए आप पाषाण युग में नहीं जा सकते .
                          दुनिया के सबसे ताकतवरनेताओं के ब्रिक्स सम्मेलन में मौजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि पेरिस में घटित खौफनाक घटना का एकजुट होकर   भर्त्स्ना  करते  हैं. ताजुब तब होता है कि इन घटनाओं पर खर्च होरहे धन पर कोई पश्चिमी देश सवाल क्यों नहीं उठता है ?प्रधान मंत्री मोदी ने ठीक प्रश्न किया कि आतंकी संगठनों को वित्तीय सहायता कैसे और कहाँ से होरही है ? वित्तीय सहयोग की जानकारी शायद आतंक के खिलाफ लड़ाई का सबसे बड़ा हथियार साबित हो.
                          ये विडंबना ही तो है कि अफगानिस्तान और इराक़ पर हमलों के नायक अर्थात अमेरिका जैसे मुल्क आज उन हमलों के लिए अफ़सोस जाता रहे हैं ये जगजाहिर है कि ऐसे मुल्क अपने हितों की पूर्ति हेतु जहाँ आतंक के के खिलाफ युद्ध का सहारा लिया तो वहीँ अनेकों संगठनों के संरक्षक भी बने, आखिर आज अमेरिका विश्व में क्रूड आयल का सबसे धनी सेठ कैसे बना ?
                                 पश्चिम देशों को समझना होगा कि दुनिया में आजतक शायद ही कोई मुल्क हो जो आतंक का शिकार न हुआ हो, इस लिए समय रहते ऐसे संगठनों पर पाबन्दी ही नहीं सार्थक पहल की भी ज़रूरत है. इराक जैसे मुल्कों में स्वार्थ पूर्ति के लिए पश्चिमी देशों ने  जिस अंदाज़ का सहारा लिया उसी की अगली कड़ी सीरिया लीबिया यमन आदि में जारी गृह युद्ध हैं. अरब देशों को भी समझना होगा कि जिस तेल के जखीरे की मल्कियत वह संभाल रहे हैं उस पर अमेरिका से लेकर नजाने कितने मुल्कों की नज़र है. अरबियों की छोटी हिमाक़त वाक़ई कितना बड़ा मसला बन रही है, इन्हे समझना होगा कि जिस नबी ( प्रोफेट मुहम्मद ) के बताए रस्ते पर मुस्लिम मुल्क चलना चाहते हैं वही मुहम्मद साहब ने  बदला लेने की कल्पना को सख्त मना किया. उनका इतिहास उठाकर देखें अरब वाले कि उन्हों ने लाखों तकलीफों के बाद कभी बदला नहीं लिया.
                                प्रश्न ये उठता है कि भयानक तबाही का पर्याय बन कर उभरे ISIS के पास अत्याधुनिक हथियारों और वाहनों की खेप आखिर उपलब्ध हो कहाँ से हो रही है. उन्हें निर्बाध रूप से धन की आपूर्ति भी जारी है, आखिर कैसे और कहाँ से ?
                                 पश्चिम देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को अपनी नीतियों पर गंभीरता से आत्ममंथन करना होगा, साथ ही समुचित संकल्प लेना होगा कि भविष्य में फिर कभी कहीं ऐसी घटना घटने के लिए जगह न हो