शाह की ताजपोशी से किसे मिलेगी शह किसे मिलेगी मात ?

सफलता के वक़्त गैर भी डुगडुगी बजाने लगते हैं, तो वहीँ असफलता अपनों के चेहरे भी दुसरी दिशा में मोड़ देती हैं. इन बातों का सबसे अधिक तजुर्बा अमित शाह को है, २०१४ जैसा हनीमून पीरियड भाजपा ने अमित शाह के ‘शह और मात’ से अर्जित किया, लेकिन २०१५ दिल्ली एवं बिहार विधान सभा के चुनाव परिणामों ने उनके अपनों को भी सौतेला बना दिया था. जिन गुणों को एक समय अमित शाह की पूंजी बताया जा रहा था, उन्हीं गुणों को हिटलरशाही प्रवृत्ति बताया जाने लगा था, लेकिन कुछ लोगों को छोड़ दें तो आज पूरी भाजपा अमित शाह के साथ खड़ी है. इस का सबसे बड़ा कारण साहस और क्षमता के गणितिक अनुपात का राजनितिक केमिस्ट्री में उनके द्वारा सदुपयोग है. फिर भी सवाल जग ज़ाहिर है कि पिछले कार्यकाल की तुलना में इस बार मिलने वाली चुनौती को आखिर वह साधेंगे किस तरह.

2014 लोकसभा हेतु उत्तरप्रदेश फतह के बाद अमित शाह की जय जयकार पार्टी के अंदर शुरू हुई थी. अमित शाह को मास्टर स्ट्रैटजिस्ट करार दिया गया, उनके चुनावी कौशल की दाद दी गई. खास बात ये थी कि यूपी में अपना रणनीतिक कौशल दिखाने के लिए अमित शाह ने समय लिया महज ग्यारह महीनों का. शाह को 31 मार्च 2013 को बीजेपी के केंद्रीय संगठन में महासचिव का दर्जा दिया गया था और उसके दो महीने बाद यानी 19 मई 2013 को बनाया गया उत्तर प्रदेश का प्रभारी. यूपी में दिखाये गये धमाकेदार प्रदर्शन के कारण ही अमित शाह पहली बार बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर ही उन्हें इस बार फिर से अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी गई है.

एक नज़र अमित शाह के सियासी सफर पर
22 अक्टूबर 1964 को मुंबई में वैष्णव परिवार में जन्मे अमित शाह का पैतृक घर गांधीनगर जिले के मानसा कस्बे में है. मानसा में आरंभिक पढ़ाई करने के बाद गुजरात के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद से बीएससी बायोकेमिस्ट्री की पढ़ाई करने वाले अमित शाह कॉलेज के दिनों में ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी से जुड़े. जब कि बतौर स्वयंसेवक उनका जुड़ाव 14 वर्ष की आयु में आरएसएस से हो चुका था. विद्यार्थी परिषद में कुशल संगठनकर्ता की छवि बनाने वाले शाह जहाँ 1982 से 1984 के बीच परिषद की अहमदाबाद शहर इकाई में सहमंत्री और मंत्री रहे वहीँ बाद में वह बीजेपी की यूथ विंग यानी भारतीय जनता युवा मोर्चा से जुड़े. 1984 में अहमदाबाद के नाराणपुरा वार्ड में युवा मोर्चा के मंत्री बनने वाले शाह आगे बढ़ते हुए राज्य इकाई में मंत्री, उपाध्यक्ष और महामंत्री बने. सफर यहीं नहीं थम और फिर 1997 में भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बन बैठे. अमित शाह इस बीच बीजेपी की कर्णावती महानगर इकाई के तौर पर जानी जाती है, उससे भी जुड़े और 1991 से 1993 के बीच इस इकाई में मंत्री रहे.

आरएसएस में सक्रिय अमित शाह की पहली मुलाकात मोदी से 1982 में हुई, ये वही दौर था जब मोदी बतौर प्रचारक युवाओं के बीच संघ का दायरा बढ़ाने में लगे थे. इसके बाद से ही अमित शाह मोदी के करीब आते चले गये. अमित शाह 1987 में दीनदयाल शोध संस्थान की गुजरात इकाई में कोषाध्यक्ष बने, जिसकी बैठकों में बतौर गार्जियन या पालक नरेंद्र मोदी अक्सर आया करते थे. 1987 में जब नरेंद्र मोदी की इंट्री संघ से बीजेपी में हुई, उस वक्त तक अमित शाह की छवि एक कर्मठ कार्यकर्ता के तौर पर बन चुकी थी.

मोदी को अमित शाह की संगठन क्षमता पर गहरा यकीन 1990 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान हो गया था. जहाँ एक तरफ इन चुनावों में बीजेपी की मतदाताओं के बीच पैठ बनाने में अमित शाह ने भूमिका अदा की वहीँ इन्हीं चुनावों में बतौर गुजरात बीजेपी संगठन महामंत्री मोदी की भी धाक जमनी शुरू हुई. 1991 में जब लोकसभा के चुनाव हुए और आडवाणी गांधीनगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े, तो अमित शाह ने प्रचार में योगदान दिया. 1996 में जब अटल बिहारी वाजपेयी गांधीनगर से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए आए, तो अमित शाह उनके चुनाव प्रभारी बने. उसके बाद शाह गांधीनगर लोकसभा सीट के लिए 1998,1999, 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में आडवाणी के चुनाव प्रभारी रहे. चुनाव प्रभारी की भूमिका में अमित शाह आडवाणी के भी काफी करीब आए.
1995 में केशुभाई पटेल की अगुआई में गुजरात में भाजपा की पहली सरकार बनआने में अहम भूमिका निभाने वाले नरेंद्र मोदी ने शाह के बेमिसाल योगदान हेतु उन्हें तोहफा स्वरुप अमित शाह को राज्य सरकार की एक महत्वपूर्ण संस्था गुजरात स्टेट फाइनेंशियल कॉरपोरेशन का अध्यक्ष बनाया. वर्ष 1995 में अमित शाह को जब ये पद मिला, उस समय उनकी उम्र थी महज 31 साल और वो इस संस्था के इतिहास में सबसे कम उम्र के अध्यक्ष बने थे. शाह ने अपनी प्रबंध कुशलता के बल पर इस संस्था को लाभ में पहुंचा दिया, लेकिन उनका ये कार्यकाल लंबा नहीं चला. 16 सितंबर 1995 से 15 अक्टूबर 1996 यानी महज तेरह महीने का रहा ये कार्यकाल. इसी दौरान राज्य में शंकरसिंह वाघेला ने विद्रोह कर दिया था, जिसकी वजह से केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी, सुरेश मेहता थोड़े समय के लिए मुख्यमंत्री बने और आखिरकार पार्टी तोड़कर वाघेला खुद 23 अक्टूबर 1996 को मुख्यमंत्री बन बैठे, कांग्रेस के सहयोग के साथ.

गुजरात में जब 1995 में वाघेला ने विद्रोह किया, तो इसका ठीकरा फूटा नरेंद्र मोदी के उपर. मोदी को गुजरात से राजनीतिक वनवास मिला और वो दिल्ली चले गये. हालांकि मोदी के दिल्ली चले जाने के बाद भी उनका और अमित शाह का रिश्ता गहरा बना रहा. मोदी के दिल्ली चले जाने के बाद भी अमित शाह गुजरात में कमजोर नहीं पड़े. इसका सबूत मिला 1997 के फरवरी महीने में, जब अहमदाबाद की सरखेज विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव हुए. दरअसल बीजेपी के वरिष्ठ नेता और राज्य विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष हरिश्चंद्र पटेल की मौत के कारण ये सीट खाली हुई थी. राज्य में तब तक बीजेपी में दो फाड़ हो चुकी थी और शंकरसिंह वाघेला के नेतृत्व में कांग्रेस के समर्थन से सरकार चल रही थी. इस चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में बीजेपी ने अमित शाह को अपने प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में उतारा. आठ फरवरी 1997 को चुनाव हुए और जब ग्यारह फरवरी को नतीजे घोषित किये गये, तो अमित शाह कांग्रेसी उम्मीदवार दिनेश ठाकोर को 24482 वोटों के मार्जिन से हराकर विजयी हुए. इसके बाद से अमित शाह ने सरखेज से कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 1998 में जहां वो 132477 मतों के मार्जिन से चुनाव जीते, तो 2002 में 158036 मतों के मार्जिन से. 2007 में तो जीत का ये मार्जिन बढ़कर 235823 मतों का हो गया. विधानसभा चुनावों में दो लाख पैंतीस हजार मतों से भी अधिक के मार्जिन से जीत, ये साबित करता है कि अपने विधानसभा क्षेत्र में अमित शाह की पकड़ किस कदर थी. ध्यान रहे कि इसी सरखेज सीट के अंदर जुहापुरा भी आता था, जो अहमदाबाद शहर में मुस्लिम समुदाय का सबसे बड़ा रिहाइशी इलाका है.

मोदी जब गुजरात में अक्टूबर 2001 में बतौर मुख्यमंत्री वापस लौटे, उस वक्त अमित शाह न सिर्फ दूसरी बार बीजेपी विधायक बन चुके थे, बल्कि पार्टी की राज्य इकाई में उपाध्यक्ष भी थे. मोदी के करीबी होने के कारण, 1998 में जब केशुभाई पटेल की सरकार दोबारा आई, तो अमित शाह को न तो मंत्रिमंडल में जगह मिली और न ही किसी बोर्ड-निगम में. केशुभाई से अमित शाह के संबंध तनावपूर्ण थे और इसका कारण था मोदी से उनकी नजदीकी. हालांकि मोदी ने भी जब अक्टूबर 2001 में अपना पहला मंत्रिमंडल बनाया, तो इसमें अमित शाह को नहीं लिया. अमित शाह संगठन में ही रहे और जब फरवरी 2002 में राजकोट-2 सीट से मोदी अपना पहला चुनाव लड़े, तो उस उपचुनाव में मोदी के चुनाव प्रभारी बने अमित शाह. मोदी को जीत मिली, उसके तीन दिन बाद ही गुजरात में गोधरा कांड के बाद दंगे भड़क उठे और फिर जब समय से पहले ही दिसंबर 2002 में विधानसभा चुनाव हुए और बीजेपी को जीत मिली, तो मोदी के नये मंत्रिमंडल में अमित शाह को भी जगह मिली. मोदी गृह विभाग के कैबिनेट मंत्री खुद रहे और इसी गृह विभाग में राज्य मंत्री बनाकर अमित शाह को अपने ठीक नीचे रख लिया. गृह विभाग के अलावा यातायात, मद्यनिषेध और आबकारी खाते का भी प्रभार रहा अमित शाह के पास बतौर राज्य मंत्री.

अमित शाह न सिर्फ इस दौर में लगातार मोदी का विश्वास जीतते गये, बल्कि ताकतवर भी बनते गये. नतीजा ये हुआ कि जब 2007 में विधानसभा चुनावों में जीत के बाद एक बार फिर से मोदी की अगुआई में गुजरात में बीजेपी की सरकार बनी, तो अमित शाह गृह राज्य मंत्री के तौर पर तो कायम रहे ही, इसके अलावा ग्यारह और विभागों के मंत्री भी बने. ये विभाग थे- ट्रांसपोर्ट, पुलिस हाउसिंग, बोर्डर सिक्यूरिटी, सिविल डिफेंस, ग्राम रक्षक दल, होम गार्ड, जेल, मद्यनिषेध, आबकारी, विधि व न्याय और संसदीय कार्य. ये मोदी मंत्रिमंडल में अमित शाह के बढ़ते रसूख का साफ सबूत तो था ही, ये भी बताता था कि आखिर अमित शाह मोदी के कितने करीब हैं.

इस दौरान अमित शाह विवादों में भी घिरे. सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले की जांच जब सीबीआई के पास गई, तो अमित शाह को भी आरोपी बनाकर सीबीआई ने अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी. ऐसे में 24 जुलाई 2010 को अमित शाह ने मोदी मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और अगले दिन सीबीआई के सामने सरेंडर कर दिया. इसके बाद अमित शाह को अगले तीन महीने साबरमती सेंट्रल जेल में गुजारने पड़े और फिर वो 29 अक्टूबर 2010 को गुजरात हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से रिहा हुए. हालांकि तुरंत बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत में शर्त डाल दी कि वो गुजरात में रह नहीं सकते. आखिरकार ये शर्त 27 सितंबर 2012 को सुप्रीम कोर्ट ने हटा ली और उसके बाद अमित शाह गुजरात लौटे और फिर लड़े 2012 का विधानसभा चुनाव. इस बार अमित शाह का चुनाव क्षेत्र था अहमदाबाद शहर का नाराणपुरा, जो उनकी पुरानी विधानसभा सीट सरखेज का ही एक हिस्सा था और नये सीमांकन के बाद अस्तित्व में आया था. इस चुनाव में भी अमित शाह ने कांग्रेसी उम्मीदवार जीतु पटेल पर 63335 मतों के मार्जिन से जीत हासिल की. चूंकि अमित शाह पर सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति मुठभेड़ मामले में केस चल रहा था, इसलिए मोदी के नये मंत्रिमंडल में अमित शाह को जगह नहीं मिली. लेकिन मोदी से उनकी नजदीकी और चुनावी कौशल का फायदा तब मिला, जब 31 मार्च 2013 को उन्हें बीजेपी के केंद्रीय संगठन में महासचिव का पद मिल गया. उस जिम्मेदारी के बाद अमित शाह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है और यूपी में बीजेपी के लिए चाणक्य की भूमिका निभाते हुए पार्टी में नई जान फूंक दी, जिसका नतीजा शानदार परिणामों के तौर पर मिला. हालात ऐसे बने कि बीजेपी जहां राज्य में 71 सीटें हासिल कर पाई, वही दो सीटें सहयोगियों के खाते में आई. बहुजन समाज पार्टी का खाता तक नहीं खुला. जहां तक समाजवादी पार्टी का सवाल है, तो उसमें भी सिर्फ मुलायम और उनके परिवार के सदस्य ही अपनी सीट बचाने में कामयाब हो पाए. कांग्रेस में भी यही हाल रहा, जहां सिर्फ सोनिया गांधी रायबरेली से और राहुल गांधी अमेठी से चुनाव जीत पाए. समाजवादी पार्टी में उसके सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव मैनपुरी और आजमगढ़ से, उनकी बहू डिंपल यादव कन्नौज से, चचेरे भाई धर्मेद्र यादव बदायूं से तो भतीजे अक्षय यादव फिरोजाबाद से चुनाव जीत पाए. बीएसपी की तरह अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोकदल का भी खाता यूपी में नहीं खुल पाया. अजीत सिंह को अमित शाह ने पूर्व आईपीएस अधिकारी सत्यपाल सिंह के जरिये बागपत से हरवा दिया. जाहिर है, इस प्रदर्शन के साथ अमित शाह जहां बीजेपी को उत्तर प्रदेश की सियासत में शीर्ष पर लेकर गये, वही तमाम विपक्षी पार्टियों को धरातल पर धकेल गये. इस शानदार प्रदर्शन के कारण ही उन्हें उत्तर प्रदेश की राजनीति का चाणक्य भी कहा जाने लगा, जहां से महज कुछ महीनों के अंदर वो बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन बैठे.

लेकिन बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद अमित शाह के लिए राह आसान नहीं रही. एक तरफ जहां आनलाइन सदस्यता अभियान के जरिये वो बीजेपी को दुनिया की सबसे अधिक सदस्यता वाली राजनीतिक पार्टी का तमगा दिलाने की कोशिश करते रहे, तो दूसरी तरफ दिल्ली और बिहार में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद अमित शाह की रणनीति और कार्यकुशलता पर भी दबी जुबान में सवाल उठने शुरु हो गये. अब जब वो बीजेपी के दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं, उनके सामने चुनौतियां एक के बाद एक लगातार आने वाली है अगर चुनौती पार्टी को असम में बेहतर नतीजे दिलाने की है तो पश्चिम बंगाल से लेकर यूपी और फिर उनके अपने गृह राज्य गुजरात में भी अगले दो साल के अंदर होने वाले चुनाव हार्दिक पटेल के बागी तेवर के कारण कम नहीं. अगर अमित शाह इन चुनावों में कामयाबी दिला पाते हैं तो उनके लिए अपने रिकार्ड को ठीक करना संभव हो पाएगा, अन्यथा सवाल न सिर्फ उन पर बल्कि उनके सबसे बड़े हिमायती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी उठेंगे, जिनके जबरदस्त समर्थन के कारण अमित शाह सियासत में इस उंचाई तक पहुंचे हैं .