समरथ को नहीं दोष गुसाईं !

देश के मौजूदा परिदृश्य में उक्त पंक्ति का अर्थ है मैं चाहे ये करूँ मैं चाहे वो करूँ मेरी मर्ज़ी . अतः देखिए इस ब्लॉग को और विचार कीजिये की हम हमारा देश कहाँ जारहा है……आखिर विकास क्यों लाकुग्रस्त प्रतीत हो रहा है. स्वयं से प्रश्न कीजिये की हमने वोट किसी भावना में बाह कर तो नहीं दी थी ? आज दिए गए वोट के आधार पर हमें सही इन्साफ मिला ?