सरकार पेट्रो से ही सही अच्छे दिनों के दर्शन करा दीजिए

             देश में बढ़ती महंगाई का कारण अगर रोज़मर्रा की चीज़ों की बढ़ती कीमतें हैं तो कीमतों के बढ़ने का कारण सीधे तौर पर पेट्रोलियम की बढ़ती कीमतें हैं । महंगाई के संकल्पना की तस्वीर यहीं तक साफ़ तसव्वुर है, लेकिन, ज्यों ही पेट्रोलियम की कीमतों की निर्भरता जानने की कोशिश की जाती है धुंधलाती तस्वीर संकेत देती है कि पेटोलियम की कीमतों की निर्भरता सिर्फ और सिर्फ स्वतंत्र भारत की निर्भीक आयल कंपनियों की स्वार्थपूर्ण मुनाफाखोरी है तो वहीं कंपनियों पर सरकार के घटते नियंत्रण तो नहीं ? असल में कंपनियों को जब देश में डीज़ल या पेट्रोल की कीमत बढ़ानी होती हैं तो कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों की दुहाई दी जाती है । यानी कीमत की निर्भरता वाक़ई कच्चे तेल के बाजार पर होती है,  तो क्या सीधे तौर पर मान लेना चाहिए कि देश की आम ज़िंदगी कहीं न कहीं कच्चे तेल के बाजार पर निर्भर है.
                      लेकिन ये कैसी विडंबना है कि दिसंबर २००४ में कच्चे तेल की कीमत जिस स्तर पर थी ११ वर्षों बाद उसी स्तर पर पिछले एक वर्ष में कीमतें घट कर एक बार फिर आ पहुंचीं हैं. प्रश्न जायज़ है कि कच्चे तेल की घाटी हुई कीमतों के बावजूद डीज़ल एवं पेट्रोल की कीमत क्यों नहीं घटतीं ?
                            असल में १८ महीनों की मोदी सरकार की अगर बात की जाए तो इस सरकार के कार्यकाल के दौरान कच्चे तेल की कीमतें  ५७% घटीं, सरकार ने ४ बार एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ाकर २००% का मुनाफा हासिल किया । तो अंदाज़ लगाइये कि तेल कंपनियों की इनकम मुनाफे की वजह से कितनी बढ़ी होगी । अब बात कंपनी के मुनाफे  की होरही है तो जान लीजिये कि पूर्व में एक बैरल कच्चे तेल मंगाने हेतु ६३३१/- रूपये खर्च होते थे कंपनी के, लेकिन आज ५७% की गिरावट के आधार पर कंपनी को मात्र २७२६ रूपये ही एक बैरल की कीमत चुकानी पड़ी है । रही बात सरकार की तो उसने २०१४-१५ में ७४ हज़ार करोड़ रूपये तो एक्साइज़ ड्यूटी से कमाए थे । लेकिन इस साल सरकार ने कॉर्पोरेट के अंदाज़ में एक्साइज़ से कमाई का लक्ष्य १.०७ लाख करोड़ तय किया है। जो कहीं न कहीं इशारे करता है कि सरकार कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद कोई ख़ास बदलाव डीज़ल एवं पेट्रोल की कीमतों में होने नहीं देंगी। किसी ने ठीक ही कहा है —
               दर्द में कोई मौसम प्यारा नहीं होता ,
               दिल हो प्यासा तो पानी से गुज़ारा नहीं होता ,
               कोई देखे तो सही हमारी बेबसी ,
               हम सभी के हो जाते हैं सरकार,
               पर कोई हमारा नहीं होता.
विशेषज्ञों की मानें तो कीमत पर समीक्षा बैठक १५ दिसंबर तक होनी है, लेकिन कीमतों में कमी तभी होगी जब सरकार फिर से एक्साइज़ ड्यूटी न बढ़ा दे, वह भी तब जब पेट्रोल पर सरकार की कमाई १०१% और डीज़ल पर २००% बढ़ी है ।