साख की जंग नीतीश और मोदी में, लालू वजूद तो कॉंग्रेस ठौर की तलाश में – बिहार विधान सभा चुनाव

देश जानता है कि खालिस अंदाज़ के धनी लालू प्रसाद १५ वर्षीय वक़्त की आज़माइश से निकलने को जितने बेताब हैं उससे कहीं अधिक अपने राजनीतिक वजूद को बचाने की जद्दोजहद भी कर रहे हैं. ये वजूद की जद्दोजहद ही तो है कि जे.पी. के शागिर्द लालू नीतीश के साथ आ खड़े हुए. ये वही नीतीश हैं जिन्हों ने कभी लालू के ही राजनीतिक वजूद को हिला कर रख दिया था. जी हाँ आज नीतीश जो दस वर्षों से सुशासन बाबू बन कर ‘बढ़ चला बिहार’ का श्रेय लेने हेतु अपनी साख का साज़ छेड़ते हुए विकास बाबू बनने के लिए देश में मोदी सूनामी से पूर्व ही राजग से अलग होकर मोदी के विकास मॉडल को खुली चुनौती देते हुए विश्व की सब्से बड़ी पार्टी भाजपा का बराबरी से सामना करने का बेड़ा उठाया है. दूसरी तरफ़ दिल्ली पराजय के बाद भाजपा ये जताने में कि २०१४ लोकसभा चुनाव में मिली जीत महज़ एक इत्तेफ़ाक़ नहीं, अतः भाजपा बिहार में साख की जंग लड़ रही है. कमोबेश लोकसभा चुनाव के दौरान आई मोदी सूनामी में बह चुकी कॉंग्रेस अपने ठौर की तलाश में बिहार की ज़मीन से अपना रास्ता बनाने को बेताब है.

१९७७ में कॉंग्रेस को मिली अस्थाई दूरी, लेकिन १९९० से अबतक सत्ता कॉंग्रेस से है रूठी.
१९७७ अर्थात सातवाँ विधान सभा चुनाव बिहार में जनता पार्टी का उदय कॉंग्रेस पार्टी के अस्त का इशारा था, क्यों कि कॉंग्रेस १९८० की बिहार वापसी को बरकरार रख न सकी, और १९९० अर्थात १०वें विधान सभा चुनाव ने कॉंग्रेस को सत्ता से दूर कर दिया .
१९७७ के कॉंग्रेस अस्त की पटकथा तो १९७४ के ‘संपूर्ण क्रांति’ अर्थात ‘छात्र आंदोलन’ ने जयप्रकाश के नेतृत्व में रची . बिहार ही नही देश के कई राज्यों में कॉंग्रेस की सरकारें करारी शिकस्त की शिकार होती चली गई. १९९० की करारी शिकस्त का ज़िक्र भी ज़रूरी है, इसकी पटकथा १९८७ में बोफोर्स तोपकी सौदेबाज़ी में हुई कमीशनखोरी ने तब लिखी जब तत्कालीन प्रधान मंत्री राजिवगांधी के ख़ासमखास विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंत्रीपद त्याग सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला. परिणामस्वरूप लोकसभा के साथ बिहार विधान सभा चुनाव में भी कॉंग्रेस की करारी शिकस्त हुई. इस शिकस्त के बाद कॉंग्रेस आजतक सत्ता का वनवास झेल रही है.

चुनावी परिस्थिति में कॉंग्रेस की स्थिति.

कभी बिहार ही नहीं संपूर्ण भारत में सत्ता का दूसरा नाम कॉंग्रेस हुआ करती थी , लेकिन एक अरसे से चली आरही मुख़ालफ़त के बावजूद आज भी कॉंग्रेस का जीता जागता वजूद जनता के दिलो दिमाग़ में ज़िंदा है, जो आज के कॉंग्रेसियों के लिए फख्र की बात है. बीते कल पर होने वाले फख्र में छिपा दर्द कॉंग्रेस की गिरती साख को उजागर करता है. फिर भी सालों साल से करारी शिकस्त की पीड़ा झेल रही कॉंग्रेस आज भी बाज़ीगर ही साबित होती है. शायद इसी लिए १९७७ की कॉंग्रेस के खिलाफ जे.पी. नेतृत्व से उपजी ‘संपूर्ण क्रांति’ के सिपाही लालू नीतीश में कॉंग्रेस को ठौर नज़र आता है, वह भी तब, जब २०१५ विधान सभा चुनाव हेतु २४३ सीटों में सिर्फ़ ४१ सीटें कॉंग्रेस को नसीब हुईं. इस गठबंधन का मुख्य कारण पिछ्ले चुनाव में कॉंग्रेस का २४३ पर लड़ना और सिर्फ़ ४ सीटों पर जीतने की टीस है.

कॉंग्रेस का मज़बूत पक्ष.

आज़ादी पश्चात देश सिर्फ़ विकास चाहता था, कोई शक़ नहीं कि उस दौर में विकासशील भारत की रचना गढ़ने में कॉंग्रेस का सराहनीय योगदान रहा होगा, इसी लिए ख्यातिलबध कॉंग्रेसी नेताओं की भूमिका भी कहीं न कहीं आज भी जनता के दिलों में बस्ती है, इसी लिए आज भी कॉंग्रेस में सियासत और सत्ता के लिए वही जुनून है, परिणामस्वरूप कॉंग्रेस बार बार विकल्प बन कर उभरती रही है.

कॉंग्रेस का कमज़ोर पक्ष.

कॉंग्रेस ने केंद्र में २००४ से २००९ के शासन में जो आकर्षण प्राप्त किया वह २००९ से २०१४ कार्यकाल में तार तार होता रहा. परिणामस्वरूप २०१४ में भाजपा ने कॉंग्रेस की राजनीतिक ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया. अब कॉंग्रेस को जहाँ चुनौती खोए वोट बैंक की वापसी की है. तो वहीं नए जनाधार को कॉंग्रेस से जोड़ने की ज़रूरत की भी है. शायद यहीं कॉंग्रेस की नई पीढ़ी सबसे कमज़ोर कड़ी है. जनमत जुटाने के पुराने तरीक़े पार्टी की नीति की आवश्यकताओं से जुड़ा है.

पूर्वज जनता पार्टी का इतिहास ना दोहरा सकी भाजपा आज तक बिहार विधान सभा में,.

जी हाँ, भाजपा की पूर्वज, जनता पार्टी ने १९७७ में कॉंग्रेस युग पर पहला विराम लगाते हुए बिहार की सत्ता संभाली, ये विडंबना ही है कि जनता पार्टी ने भाजपा को जन्म दिया, लेकिन भाजपा आजतक बिहार की पूर्ण सत्ता से दूर है.
बिहार में सातवीं विधान सभा के दौरान जनता पार्टी ने १९७७ से १९८० तक बागडोर संभाली, लेकिन कॉंग्रेस ने ज़बरदस्त वापसी करते हुए सत्ता पर १९८० से १९९० तक फिर राज किया. लेकिन इन दस वर्षीय कार्यकाल में कॉंग्रेस अस्थिरता की शिकार होती रही, परिणामस्वरूप १० वर्षों में कॉंग्रेस ने ६ मुख्यमंत्री बिहार को दिए, ६ मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल ने ऐसा आज़ाब नाज़िल किया की आज तक कॉंग्रेस बिहार वापसी नहीं कर सकी, शायद यहीं से बिहार विकासहीनता का शिकार होने लगा. कॉंग्रेस की नाकामी से भाजपा का बिहार उदय हुआ, नहीं बिल्कुल नहीं, असल में १९९० से आज तक बिहार की सत्ता जे.पी. के चेलों लालू नीतीश के पास ही रही. ये अलग बात है की भाजपा ने २००५ में हुए बिहार विधान सभा चुनाव में ५५ सीटों पर जीत दर्ज कर राजग के बैनर तले नीतीश की सत्ता साझेदार बनी. भाजपा ने २०१० के चुनाव में तरक़्क़ी करते हुए ९१ सीटों पर जीत हासिल कर पुनः नीतीश सरकार की सहयोगी बनी. नीतीश सरकार ने राजग सदस्य होने का धर्म निभाते हुए २००५ ही नहीं २००९ की सरकारों में सुशील मोदी को उपमुख्यमंत्री का पद देकर भाजपा की अहमियत को स्वीकारा. अटल आडवाणी के दौर में भाजपा सहयोगी जदयू ने मोदी युग की दस्तक होते ही नीतीश ने राजग से नाता तोड़ २०१४ लोक सभा चुनाव जदयू ने अलग लड़ते हुए भाजपा से नाता तोड़ा. मोदी युग की मुहर लगते ही जदयू चोट पर चोट खाती रही लेकिन सत्ता में जदयू ही बनी रही. हार को स्वीकारते हुए नीतीश ने बिहार के मुख्यमंत्री पद को छोड़ते हुए मांझी को बिहार की सत्ता सौंपी, मांझी को मोदी के क़रीब होते देख लालू ने नीतीश को सहयोग कर बड़े भाई कहलाने का फ़र्ज़ निभाया. भाजपा के पास ओबीसी के लिए कुशवाहा थे, २०१४ लोकसभा से क़रीब हुए पासवान दलित वोटों के लिए रणनीति का हिस्सा पहले ही थे. मांझी के रूप में भाजपा को बिन माँगी मुराद महादलित चेहरे के रूप में मिल गई. लेकिन, २०१५ चुनाव में भाजपा के लिए मांझी जितन लाभकारी होंगे उतने ही अनसुलझी पहेली भी बनसकते हैं.

चुनावी परिस्थिति में भाजपा की स्थिति.

अरसे की सियासी समझ का तजुर्बा, संघ की रणनीति में निखरती भाजपा ने पूरे देश में यदा कदा मिले मौकों से हुकूमत चलाने की क़ाबलियत से देश को अवगत किया. साथ भी बखूबी मिला कॉंग्रेस की खिसकती ज़मीन का. निखरती भाजपा का काफिला अपनी पताका फहराता २०१४ लोकसभा चुनाव में बिहार में मिले ७३.३३% वोटों के साथ मोदी युग की तारीख लिखते बिहार २०१४ चनव आ पहुँची. लेकिन १६वा विधान सभा चुनाव चुनावतियों से भरा हुआ है. याद कीजिए २००५ का पहला चुनाव जब ३७ सीटें मिली भाजपा को, लेकिन, सभी दल बहुमतहीन रहे . चुनाव दोबारा हुए भाजपा ने तरक़्क़ी करते हुए ५५ सीट हासिल की, २०१० मे ९१ सीटें मिली, लेकिन इन सफलताओं को खालिस भाजपा सफलता कहा नहीं जासकता, कारण साफ हैं इन सफलताओं में जदयू का जादू शामिल था.
अतः २०१५ चुनाव में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चनौती २०१४ लोकसभा चुनाव की सफलता को दोहराने की है. देश को इस बात का भी इल्म है की भाजपा की अबतक बिहार सफलता मुखालिफ़ मत विभाजन पर निर्भर करती आई है. इस लिए भाजपा मुखालिफ़ मत विभाजन की कामना इस बार फिर ज़रूर कर रही होगी.

भाजपा का मज़बूत पक्ष.

एक ओर युवा मतदाताओं में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का जादू, दूसरी तरफ केंद्र में भाजपा की सरकार होना भाजपा का सबसे मज़बूत पक्ष है. विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा है, इसका लाभ राज्य के बूत स्तर में संगठित कार्यकर्ता के नेटवर्क को मज़बूत करने के लिए टॉनिक से कम नही होगा.
कभी सोशल इंजीनियरिंग की शरुआत भाजपा के खिलाफ चुनाव जीतने के लिए सबसे सफल रणनीति थी. लेकिन, आज सोशल इंजीनियरिंग भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा है, तभी तो ब्राह्मण, राजपूत , ओबीसी, दलित और महंडलित को जोड़ कर भाजपा चुनावी माहौल को अपने बस में करने के जतन कर रही है.

भाजपा का कमज़ोर पक्ष.

भाजपा ने दिल्ली से सबक़ लेते हुए बिहार में मोदी के चेहरे को सामने रख चुनावी बिगुल बजाया. लेकिन, बिहार की जनता जानती है उसे बिहारी मुख्यमंत्री ही मिलेगा, मोदी नहीं. फिलहाल नीतीश के समान्तर भाजपा में कोई है नहीं. शायद इसी लिए मतदाताओं का एक वर्ग भ्रमित ज़रूर होगा कि नीतीश को छोड़ कर किधर जाएँ.
कमज़ोरी का एक अन्या पहलू भाजपा के कद्दावर नेताओं के सगे संबंधियों को टिकट नहीं मिलना भी है. जिनकी बग़ावत भाजपा के बने बनाए समीकरण के बिगड़ने का मुख्य कारण हो सकती है.
देश में लगातार हो रहीं संप्रदायिक घटनाओं पर प्रधानमंत्री की चुप्पी कहीं ना कहीं बिहार वोटरों के एक हिस्से को सोचने पर मजबूर करेगी की भाजपा के साथ जाएँ या नीतीश के साथ.

दो पूर्व मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी के बावजूद राजद लड़ रहा वजूद की लड़ाई.

ये कैसी विडंबना है कि लालू और राबड़ी देवी के रूप में दो पूर्व मुख्यमंत्री और उनके लगभग १५ वर्षीय शासन के बावजूद जनतादल की अगली पीढ़ी अर्थात राजद १९९० से २०१५ तक के कार्यकाल के बावजूद अपने वजूद के लिए संघर्षरत है. परिणाम ये की २००५ से अबतक हुए लोकसभा एवं विधान सभा चुनाव में राजद का प्रदर्शन गिरता जा रहा है.
बिहार विधान सभा चुनाव १९८५ की १९६ सीटों की तुलना में कॉंग्रेस १९९० में ७१ सीटों पर खिसक गई, कारण लालू युग का उदय था. जनता दल अपने सुनहरे दौर में जी रही थी लालू ने 122 सीटों के साथ ५ वर्षीय कार्यकाल पूरा करते हुए १९९५ विधान सभा चुनाव में तरक़्क़ी करते हुए १६७ सीटों के साथ जहाँ कॉंग्रेस को हाशिए पर धकेला वहीं युवा भाजपा को उस दौर में कभी संभलने का मोका नहीं दिया. ये वही दौर था जब लालू पर चारा की आँच आई और मुख्यमंत्री बनीं राबड़ी देवी. राज्य बँटवारे के साथ झारखंड का उदय हुआ, इस लिए ३४२ की तुलना में बिहार २४३ सीटों के साथ आगे बढ़ा. इसी दौर में जनता दल टूटा राजद ने दस्तक दी.
१२वें विधान सभा चुनाव में राजद को १०३ सीटें मिलीं, समता पार्टी को २८ वहीं भाजपा को ३९ सीटें. २०० से २००५ का दौर लालू एवं राजद के लिए सबसे खराब दौर रहा. वा भी तब जब राजद खुद सत्ता में थी. बुरे दौर का खामियाज़ा राजद को खुब भुगतना पड़ा, वह भी तब जब कॉंग्रेस का साथ लालू को मिला. लालू की राजद सरकार रुखसत हुई. लेकिन लालू तो लालू हैं उन्हों ने नया ठौर तलाशा केंद्र की मनमोहन सरकार में रेल मंत्रालय संभाल कर, रेल को रेकॉर्ड आमदनी भी इसी दौर में हुई, इस तरह लालू का वजूद कायम रहा. लेकिन २००९ लोकसभा चुनाव में मनमोहन सरकार पार्ट-२ में कॉंग्रेस ने लालू को अहमियत नहीं दी, लालू की बिहार वापसी हुई. लालू ने २०१० विधान सभा चुनाव हेतु राम बिलस को साथ लिया , लेकिन चुनावी दंगल में जनता दल यू और भाजपा की जुगलबंदी ने राजद को हाशिए पर धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी .
लेकिन लालू की कद्दावर छवि, अलग अंदाज़ ने राजद को कभी हारने नहीं दिया. शायद इसी लिए पूर्व जीतन राम मांझी की बग़ावत पर वक़्त चाल को पढ़ने में माहिर लालू ने नीतीश सरकार को सहारा देकर स्वम् टॉनिक ग्रहण किया. जो राजद के राजनीतिक स्वास्थ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है. नीतीश ने भी बड़े भाई का भरपूर साथ देते हुए कॉंग्रेस के क़रीब होते हुए २०१५ विधान सभा चुनावी दंगल मे ललकार लगाई.

चुनावी परिस्थितियों में राजद की स्थिति.

१९९० से २००५ तक सत्ता सुख, २००५ से २०१५ तक सत्ता से दूर यानी वनवास, बहुत कुछ बदलता दिखा राजनीतिक प्रयोगशाला यानी बिहार में, नहीं बदले तो लालू, वही बेबाक खांटि अंदाज़, इसी अंदाज़ को सामने रख लालू प्रसाद एक बार फिर बिहार में राजद की कमान संभाले हुए हैं.
जनता दल टूटा लालू अलग हुए और नया आशियाँ राष्ट्रीय जनता दल बना उसके आँगन से से राजनीतिक लड़ाई लड़ते हुए आगे बढ़े, बीते दौर से से लोग कहते आरहे हैं की लालू का दौर ख़त्म, लेकिन, ये लालू हैं जिनके सियासी दरवाज़े खुलते हैं वंचित तबके की दहलीज़ में, मुस्लिम वोटों पर आज भी लालू ही क़ाबिज़ है. कभी समाजवाद की परिभाषा का गीत रचने वाले लालू आज की पीढ़ी के साथ समाजवाद के बुज़ुर्ग रहनुमा बनकर नीतीश ही नहीं खुद को भी सत्ता के आँगन तक पहुँचाने हेतु मशक़्क़त में है.

लालू जिस क़ाबलियत से मोके भुनाते आए हैं इसकी मिसाल ही तो है, जब अमित शाह ने ये कहते हुए की भाजपा ने देश को पहला ओबीसी प्रधानमंत्री दिया है, लालू ने इसे मोके के रूप में भुनाते हुए आरक्षण की राजनीतिक पिच पर ऐसे प्रहार जड़े की चुनाव लालू व्रसेज़ भाजपा परिभाषित हो रहा है.
फिर भी अपराध, भ्रष्टाचार, लालू का सज़ायाफ़्ता होने आदि की छीटें कहीं ना कहीं जनता के एक हिस्से को महांगठबंधन के क़रीब होने से रोकेंगी. इन्ही बिंदुओं के कारण लालू ने अपनी संसद सदस्यता भी गवाई.
लेकिन, आज लालू की टीम युवा है. लालू के दो बेटे भी मैदान में हैं. अब देखना होगा की लालू का पराक्रम तोहमतों पर हावी होते हुए राजद को नीतीश संग सत्ता के कितने क़रीब ले जा पता है ?

राजद का कमज़ोर पक्ष

लालू के कद के असर का नतीजा है की राजद कहीं ना कहीं दल कम वन मैन शो अधिक है. जो यही नहीं, परिवारवाद, आरक्षण की पिच बना उसपर पर लालू के ज़बानी शॉट कहीं ना कहीं निर्वाचन आयोग की दहलीज़ तक पहुँचना आदि पहलू राजद की कमज़ोरी को उजागर करते हैं. अभी तो चुनाव भी नहीं हुए हैं, सरकार किसकी बनेगी कोई नहीं जनता, लेकिन भाजपा बार बार लालू से जनता की दूरी बढ़ाने के किए जंगलराज-२ का मुद्दा सुनाती है. शायद बीता कल आज लालू के लिए सबसे बड़ा कमज़ोर हिस्सा है.
असदूद्दीन अगर १० सीटों पर भी लड़ते हैं तो समझ लीजिए महांगठबंधन को दर्द तो होगा. ये अलग बात है की वक़्त पड़ने पर इन्हीं सीटों की मदद से नीतीश सरकार का बिगुल बजे.

राजद का मज़बूत पक्ष.

इसमें कोई शक़ नहीं की खांटि अंदाज़ के मलिक लालू ने पिछड़ों और ग़रीबों के हवाले से पार्टी विस्तार हेतु ग्रामीण इलाक़ों को तरजीह दी है,ये लालू के पक्ष में सबसे सकारात्मक बात है. लालू ने हर उस हाशिए पर खड़े वर्ग के पक्ष में राजनीति की जो समाज में भिन्न कारणों से हाशये पर पहुँचे. शायद लालू की ये अदा पार्टी के पक्ष में वोट डालने के लिए सार्थक हो.
बिहार में हमेशा चुनाव विकास की राजनीति से आरम्भ हुए हैं, लेकिन लालू जातिगत विकास को धेयान में रख कर राजनीति करते हैं, जिस का लाभ वोटों के ध्रुवीकरण के बाद लालू को मिलता रहा.
लालू को किंग मेकर कहा जाता है. यही भूमिका उन्हे इस बार भी निभानी है. मान लीजिये महांगठबंधन बहुमत के क़रीब है तो समझ लीजिए छोटे दलों के नेता लालू के प्रभाव से सत्ता की चाभी महांगठबंधन के हवाले करने में देर नहीं करेंगे, अर्थात लालू समीकरण के सुप्रीमो भी हैं.

विकासहीन बिहार को विकासशील बनाने वाले नितीश की साख है दाँव पर.

बिहार ने जहाँ १९७२ की छठी विधान सभा तक कॉंग्रेस की सत्ता को लगातार देखा, वहीं १९७७ में जनता पार्टी के अल्प विराम के बाद १९८० में कॉंग्रेस फिर सत्ता में आई. लेकिन, कॉंग्रेस की इस १० वर्षीय कार्यकाल के दौरान बिहार विकासहीन , बोझिल सियासत से उकता चुका था. शायद इसी लिए जनता ने बिहार को बड़ी उमीद से लालू युग के हवाले किया. वक़्त गुज़रा १५ वर्षों का, विकास स्थिर रहा, जनता ने २००५ में लालू से बेहतर विकल्प के रूप में नीतीश की समता पार्टी को चुना. समता पार्टी भी जदयू के नए अवतार में जनता के करीब होती चली गई, और अटल सरकार में सहयोगी रहे नीतीश ने भाजपा के सहयोग से २००५ अक्तूबर में सरकार बनाई. खास बात ये रही की जदयू- भाजपा गठबंधन यानी राजग पूरी तरह से सफल रहा, परिणामस्वरूप नीतीश के ५ वर्षों ने विकास से महरूम बिहार को विकास रथ पर सवार कर दिया.
बिहार ने इसका इनाम भी खूब देते हुए २०१० में चनव में राजग को पूर्ण बहुमत देते हुए नीतीश के हवाले एक बार फिर सत्ता की बागडोर कर दी. मोदी युग के आरम्भ होते ही नीतीश ने भाजप से नाता तोड़ा, २०१५ लोकसभा चुनाव में पार्टी के लचर प्रदर्शन के बाद नीतीश ने मुख्यमंत्री पद त्याग दिया. सत्ता आई महादलित चेहरे मांझी के हाथों में, लेकिन मांझी के बागी तेवर और मोदी से बढ़ती निकटता ने मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार की वापसी कराई. उधर जैसे जैसे मांझी हम की रचना कर रहे थे, वैसे वैसे लालू नीतीश क़रीब होरहे थे. नेता मुलायम सिंह को मुखिया बना जनता परिवार के एकजुटता की जुगत शुरू हुई. बिहार विधान सभा क़रीब आते ही नेता जी ने जनता परिवार से नाता तोड़ा और लालू के समधी जी ने (जदयू + राजद + कॉंग्रेस) अर्थात महांगठबंधन के खिलाफ विधान सभा चुनाव में तीसरा मोर्चा खड़ा कर दिया. इस तीसरे मोर्चे में सपा के साथ ५ और सहयोगी मौजूद हैं.

चुनावी परिस्थिति में जदयू की स्थिति.

आज की परिस्थितियों को देखा जाए तो महांगठबंधन की लड़ाई जहाँ राजग से है, वहीं तीसरा मोर्चा भी सामने खड़ा है. तीसरा मोर्चा भी अपनों के बागी तेवर से ही उपजा है. पिछले दो चुनावों में जनता का भरपूर प्यार प्राप्त करने वाले नीतीश को सबसे बड़ी चुनावती इस प्यार को ताज़ा रखने की है. असल में विकट समय में नीतीश ही तो हैं जिन्हों ने बिहार के लिए उमीदों का आसमान सजाया और ज़मीनी विकास के लिए जहाँ पंचायतों और शिक्षक नियोजन में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था की तो वहीं छात्रों के लिए साइकल और पोशाक योजना से दूरगामी नीतियों का संदेश दिया जिसने विश्व में बिहार की छवि को बदला. लेकिन भाजपा से बिछड़ने की स्थिति ने बिहार की तरक़्क़ी को बाधित किया. अब वक़्त ने करवट बदला, भाजपा की जगह लालू और कॉंग्रेस हैं, इस लिए स्थिति की दशा वोटों की दिशा तय करेंगी.

जदयू का कमज़ोर पक्ष.

नीतीश की साफ सुथरी छवि एक तरफ ताक़त है तो दूसरी तरफ बीते कल के दोस्त की ताज़ा दुश्मनी भी, जो कम घातक नहीं. आज नीतीश की सबसे बड़ी मुश्क़िल विक्षुब्ध और विरोधी की एकजुटता है. मांझी का महाँदलित चेहरा जितना भाजपा के लिए टॉनिक होगा तो वहीं जदयू के लिए कहीं बड़ा कष्ट, यानी जदयू के लिए सियासत और सत्ता का संघर्ष कठिन होनेवाला है.
लेकिन, जदयू की सबसे कमज़ोर कड़ी संगठन और संसाधन है, जहाँ एक तरफ जदयू में कार्यकर्ताओं से अधिक नेता हैं तो दूसरी तरफ संसाधनों की कमी समीकरण बिगाड़ने के लिए ज़िम्मेदार होसकती हैं. संगठन और संसाधन में कमी किसी भी हद तक घातक हो सकती है महानगठबंधन में बुज़ुर्ग रहनुमा लालू यादव जिस तेज़ी से विरोधी खेमा पर ज़ुबानी वॉर कर रहे हैं उसी तेज़ी से विरोधी खेमा जनता को चेता रहे हैं की जंगल राज -२ से बचिए. इस लिए लालू के दाग नीतीश की साफ छवि पर हावी हुए तो नुक़सान महांगठबंधन को होगा.

जदयू का मज़बूत पक्ष.

साफ़ सुथरी बेदाग़ छवि के मलिक नीतीश शतरंज की सुलझी बिसात पर अनसुलझी चाल चलने में माहिर हैं. शायद इसी लिए जदयू अन्य पार्टियों की तुलना में नेतृत्व सबसे मज़बूत कंधे यानी नीतीश के हाथों में हैं. जो आखरी दम तक जीत की ललक और हारी हुई बाज़ी को भी पलटने का माद्दा रखते हैं. सच तो ये है कि नीतीश बिहार का एक नायाब चेहरा हैं जिनके समान्तर ना तो मांझी, राम बिलास हैं न ही कुशवाहा और सुशील मोदी हो सकते हैं. चुनाव विकास की पिच से हटकर आरक्षण की पिच पर होरहा है. नीतीश जहाँ विकास पुरुष हैं वहीं महांगठबंधन के चाणक्य यानि लालू आरक्षण कार्ड के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं. इस लिए नीतीश अगर फिर सरकार बनाने के क़रीब पहुँचते हैं तो कोई ताज्जुब ना होगा.