सेक्युलरवाद की अग्निपरीक्षा जारी है !

शब्द ‘सर्वधर्म सदभाव’ सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी की खोज नहीं है, ये शब्द तो महान सम्राट अशोक की कल्पना थे, तो वहीँ सम्राट अकबर की तराशी हुई आज की समाजिक बुनियाद भी है सर्वधर्म सदभाव, इसे नए कलेवर में पिरोया एक सनातनी हिन्दू महात्मा गांधी ने और परिचित किया नए रूप अर्थात सेक्युलरवाद से . जिसे आगे चलकर देश के महान प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने राजधर्म के रूप को स्वीकारा . अतः ये तो साफ है कि सेक्युलरवाद कोई विदेश से आयातित सामग्री तो है नहीं .

सोतंत्रता पश्चात देश के संविधान संस्थापक भीम राव अम्बेडकर ने सर्वधर्म सद्भाव के अर्थ सेक्युलरवाद को धेयान में रख कर ‘राज धर्म’ के पालन हेतु किसी एक धर्म को राजधर्म बनाने से इंकार करते हुए सभी धर्मावलम्बियों को आज़ादी देते हुए सर्वधर्म सदभाव की भावना से ओत प्रोत संविधान घोषित किया, जो वाकई में हमारे देश की मिटटी की मनमोहक खुशबू से सिद्ध होता है. यहाँ दो उदाहरण महत्वपूण हैं . पहला उदाहरण पाकिस्तान और बंगला देश का है, दोनों मुल्क भारतीय उपमहादीप की मिटटी के विपरीत एक खास धर्म को राजधर्म मान विकासहीन होते जारहे हैं. दूसरा नेपाल है, ये वह मुल्क है जिसने सेक्युलरवाद को अपना अपने सुनहरे भविष्य की तस्दीक की है.

लेकिन ६५ वर्षीय भारतीय लोकतंत्र धीरे धीरे देशवासियों की पवित्र सेक्युलरवाद से होरही गुमराही से बेखबर होता जारहा है . परिणामस्वरूप, सेक्युलरवाद की जड़ें खोदने वालों ने परम्परा , आस्था और कर्म की भाषा पर कब्ज़ा कर लिया है, अतः एक ओर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के शिकार होरहे हैं, तो दूसरी तरफ बहुसंख्यक सेक्युलरवाद की अदृश्य खोट के सदमें से निकल नहीं पा रहे हैं .

स्वतंत्रता पश्चात जैसे जैसे समय आगे बढ़ा सेक्युलरवाद भटकाव की दिशा में पेंगे मारता नई परिभाषाओं से परिभाषित कर हाइब्रिड सेक्युलरवाद को जन्म दिया. जिसका एक प्रमाण ये भी मिलता है कि बहुसंख्यक से दुरी बनाता सेकुलरिज़्म अल्पसंख्यकों के क़रीब आता चला गया. अब हालात सेक्युलरवाद के बदले अर्थ यानि हाइब्रिड सेकुलरिज्म को ही परिभाषित करते हैं. परिणाम स्वरुप, जाएज़ हितों की जगह हाइब्रिड सेक्युलरवाद की चादर ओढ़े वोटों के ठेकेदारों ने मुस्लिम वोटों को कहीं न कहीं सेक्युलर राजनीती का बंधक बनाने में देर नहीं की, नतीजतन अल्पसंख्यक जो आर्थिक, शैक्षिणिक रूप से पिछड़ेपन का भेदभाव झेल रहा था जिसे सच्चर कमेटी की रिपोर्टों ने भी प्रमाणित किया, वह सेक्युलरवाद की नई परिभाषाओं अर्थात हाइब्रिड सेक्युलरवाद में रमता वोट के तिलिस्म में फंसता जारहा है. वह भी सिर्फ इस सोंच के साथ कि वह वोट सिर्फ उस दल को देंगे जिस की सरकार बने वह उनकी सम्प्रद्यिक गतिविधियों से सुरक्षा करे . क्या यही सेक्युलरवाद की नई परिभाषा है है ???????????????

इसमें कोई शक नहीं कि बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक दोनों कि वोटें भटकाव से भरी उहापोह की स्थिति से में फांसी हुई हैं देश के विकास में नहीं, राजनितिक रोटी सेंकने वालों के इर्द गिर्द नाच रही हैं. परिणामस्वरुप बाबरी मस्जिद की शहादत, २००२ गुजरात दंगे , २०१३ मुज़फ्फरनगर दंगे आदि महान सम्राट अशोक, बादशाह अकबर या महात्मा गांधी के पवित्र सेक्युलरवाद को बदल कर रख दिया है. प्रश्न ये नहीं की बहुसंख्यकों ने नुकसान अधिक झेल या अल्पसंख्यकों ने , सच तो ये है की नुकसान तो भरतीयता का हुआ है.

अब तो हाल ये है की थका हारा घबराया सा पवित्र सेक्युलरवाद फ़िलहाल पूर्णरूप से संतुलन खोता प्रतीत हो रहा है. शायद इसी लिए फिलहाल जिसे भी जीत चाहिए बस उसका समय पर वोटों के ध्रुवीकरण की राजनीती करना ही जीत का पर्याय बनता जारहा है. जैसा हाल के बिहार विधान सभा चुनाव में देखने को मिल रहा है. गैर बिहारी ओवैसी अपने कड़क भाषणों से मुस्लिम वोटों को जितना अपनी ओर आकर्षित करेंगे उससे कहीं ज़्यादह आसानी से हिन्दू वोट भाजपा की ओर प्रवाहित होंगे.
अब तक जहाँ सेक्युलरवाद बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक की खींचतान पर तार तार होता रहा है, वहीँ दूसरी ओर जाति के नाम पर होने वाली राजनीती भी सेक्युलरवाद की कड़ी परीक्षा ले रही है. ज़रा सोचिए अगर महान सम्राट अशोक , बादशाह अकबर और महात्मा गांधी का तराशा हुआ पवित्र सेक्युलरवाद आज के सेकुलरिज्म अर्थात हाइब्रिड सेक्युलरवाद से हार जाता है तो समझ लीजिए आज बिहार हारेगा तो कल भारत की बारी है, इसी लिए दोनों तिलक और टोपी लगाने वाला सेक्युलरवाद का प्रतीक तब तक नहीं जब तक की वह निर्मल मन से तिलक और टोपी भारतीयता की खातिर नहीं लगाते है.