सीबीआई की साख पर राजनीतिकरण कितना विष कितना अमृत ?

                      ‘सीबीआई एक स्वतंत्र जाँच एजेंसी है ‘, भूत और वर्तमान की कई घटनायें इस तथ्य पर सवाल क्यों उठती हैं ? सीबीआई के प्रति ऐसी धारणा क्यों बनती जा रही हैं कि सीबीआई हमेशा केंद्र के सबसे बड़े लठैत की भूमिका ही निभाती आरही है ? सुप्रीम कोर्ट को क्यों लगता है कि सीबीआई पिंजड़े में बंद तोता है ? देश, देश की जनता, मीडिया इस बात से विचलित हैं कि देश में सीबीआई की साख दिन प्रति दिन गिरती जा रही है, जब कि इस स्वायत्त जाँच एजेंसी के निदेशक की कुर्सी पर बैठे आला अधिकारी इस बात से विचलित क्यों नहीं प्रतीत होते हैं ?
दिल्ली सचिवालय पर सीबीआई की तरफ से की गई कार्रवाई के बाद राजधानी का सियासी पारा इतना चढ़ गया कि पुरे देश की राजनीति बढ़ते सियासी तापमान की तपिश में लफ़्ज़ों की गरिमा तार तार करने से नहीं चूक रही। असल में संसद की बागडोर संभल रही भाजपा के समक्ष सबसे बड़ा लक्ष्य GST बिल को पास करना ही होना चाहिए था, लेकिन बड़े बड़े राजनितिक चाणक्य की मौजूदगी के बावजूद भाजपा ने अपने उठाय गए हलके कदम से घटिया एवं कमज़ोर बहस में जा फंसी।
असल में मौजूदा केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच रिश्ते कभी भी मधुर रहे नहीं, अब सीबीआई छापे ने दोनों के झगड़े में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। सीबीआई ने दिल्ली सरकार के प्रधान सचिव राजेन्द्र प्रसाद जो केजरीवाल सरकार के भी प्रधान सचिव हैं, उनके कार्यालय एवं १४ अन्य ठिकानों पर भी छापे मारे । राजनीति में वक़्त का फायदा उठाना ही सबसे बड़ा कौशल है, इस प्रतिभा के धनी केजरीवाल ने सीबीआई छापे की घटना का राजनीतिकरण कर चौतरफा हमला करते हुए केंद्र पर तीखे आरोप लगा दिए । उधर वित्तमंत्री अरुणजेटली ने राजयसभा में सफाई देते हुए कहा कि सीबीआई द्वारा की जारही कार्रवाई का सम्बन्ध न तो दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री से है और न ही उनके कार्यकाल से जुड़े किसी मामले से । उधर केजरीवाल ने सीबीआई जाँच को DDCA से जोड़ किर्ती आज़ाद और जेटली जी के बीच की कलह को उजागर कर राजनितिक छलांग लगाने की कोशिश की ।
लेकिन, तमाम पेचो- ख़म के बावजूद यह कहा जासकता है कि प्रधान सचिव के दफ्तर पर छापेमारी और मुख्यमंत्री परिक्षेत्र को सील करने की कार्रवाई का तरीका उचित नहीं था ।
कोई शक नहीं कि देश में हर मामले को सियासी रंग देने की परिपाटी रही है । पर जाँच एजेंसियों की ज़िम्मेदारी है कि उन्हें व्यवहारीकरण को ध्यान में रख कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन, हालिया कार्रवाई ने फिर एक बार सीबीआई का पीएमओ के अधीन काम करने का संकेत दे दिया। उधर कार्रवाई देख कजरीवाल और उनकी पार्टी के लोगों ने जिस अंदाज़ में प्रधान मंत्री के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया, वह वाजिब नहीं।
हालाँकि, हाल की सीबीआई एवं रेल प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई से केंद्र और राज्य के तालमेल पर सवाल उठने लाज़मीं हैं, जबकि प्रधानमंत्री ने कई बार केंद्र एवं राज्य सरकारों में बेहतर तालमेल की ज़रूरत को महसूस कर चुके है ।
ज़रा सोचिये हाल के जिन मुद्दों में भाजपा ने खुद को संसद में उलझा लिया, यदि भाजपा इन मुद्दों को शीत सत्र के बाद तरजीह देती तो क्या संसद सत्र को इतना नुकसान होता ? या फिर हफ्ते दस दिन के बाद राजेन्द्र प्रसाद की पोल खोली जाती या फिर संसद सत्र के बाद railway की ज़मीन पर बसी अवैध झुग्गी झोपड़ियों का अतिक्रमण नहीं हटाया जासकता था ? तो क्या संसद सत्र के बाद नेशनल हेराल्ड मामले को मुद्दा नहीं बनाया जासकता था ? क्या पहले GST पास करने की फ़िक्र नहीं की जासकती थी ?