GST बिल पर सरकारों की अग्निपरीक्षा जारी है !

                   २९ राज्यों एवं ७ यूनियन  टेरिटरीज के लिए भारत एक राष्ट्र है l इस राष्ट्र के लिए  विडंबना ही तो है की अधिकतर वस्तुएं देश के भिन्न राज्यों में अलग अलग तय कीमतों में बिकती हैं, कारण केंद्र और सम्बंधित राज्य की टैक्स नीति में भिन्नता है. टैक्स नीति की ऐसी परिस्थिति आम जन जीवन के वातावरण को किस प्रकार से कष्टजनक बनाय जा रही है , शायद इसी आभास ने २००० में प्रधान मंत्री अटल जी को ” गुड्स & सर्विसेज़ टैक्स ” यानी GST मॉडल हेतु पश्चिम बंगाल के तत्कालीन वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने के लिए प्रेरित किया l
                     समिति गठित होने के बाद वक़्त निकलता रहा, GST  ने फिर सर उठाया लेकिन दौर था मनमोहन सरकार का, वक़्त था केंद्रीय बजट की घोषणा का, तत्कालीन वित्त मंत्री पिo चिदंबरम ने २६ फरवरी २००६ को २००६-२००७ बजट हेतु घोषणा  की कि १ अप्रैल २०१० से पेश होगा, साथ ही उन्होंने आगे कहा कि राज्य के वित्त मंत्रियों की समिति भारत में जीएसटी की शुरुआत के लिए एक रोड मैप तैयार करने के लिए केन्द्र सरकार के साथ काम करेगी। इस घोषणा के बाद 10 मई, 2007 को एक संयुक्त कार्य समूह गठित करने का फैसला हुआ जिस के सदस्यों के रूप में राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति केंद्रीय वित्त मंत्री के सलाहकार और सह संयोजक  केंद्रीय वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग और राज्यों के वित्त सचिवों को सदस्य के रूप में स्वीकारा गया l संयुक्त कार्य समूह, विशेषज्ञों और वाणिज्य एवं उद्योग मंडलों के प्रतिनिधियों के साथ गहन आंतरिक चर्चा के रूप में अच्छी तरह से बातचीत के बाद, 19 नवंबर, 2007 को अधिकार प्राप्त समिति को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट और राज्यों की लिखित टिप्पणियों के आधार पर 28 नवंबर, 2007 को अधिकार प्राप्त समिति की बैठक में विस्तार से चर्चा हुई, कुछ संशोधन किए गए, अंततः रिपोर्ट भारत सरकार (30 अप्रैल, 2008) को भेजी गई । पिछली यूपीए सरकार चर्चा में बिल का पहला उल्लेख 2009 में किया था। वे बिल प्रस्तुत करने में सफल रहे थे लेकिन इसे पारित कर पाने में विफल रहे।17 दिसंबर 2014 को, राजग सरकार ने मामूली परिवर्तन कर इसे लोकसभा में नए सिरे से परिभाषित किया । बिल इस वर्ष २०१५ के 6 मई को मंजूरी स्वीकार हुआ। हालांकि बिल को   चुनावतियों का सामना करना पड़ेगा, कारण, दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और राज्य विधानसभाओं की 50 प्रतिशत बहुमत की जरूरत है।
                       कभी अटल जी के दौर में GST ने टैक्स के आने वाले कल के रूप में पहचान पाई, लेकिन १० वर्षीय UPA ने इसे धरतल  तक लाने में ऐसी विफलता पाई कि आज मोदी सरकार इसे पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है, अब सदन में अटका ये बिल कांग्रेस की चिंता से फिर अटका है, कांग्रेस चाहती है कि बिल की पुनः समीक्षा हो.
GST-  क्या है वस्तु एवं सेवा कर ?
गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) अप्रत्यक्ष कर है। जीके एफर्टलेस वेबसाइट की माने तो सेल्स टैक्स, सर्विस टैक्स, एक्साइज ड्यूटी को हटाकर जीएसटी बनाया जाएगा। जीएसटी लागू होने के बाद सारे टैक्स हटा दिए जाएंगे। असल में GST की ड्यूल संरचना होगी अर्थात दो घटक  :  १-  केंद्रीय जीएसटी २- राज्य जीएसटी l कानून बनाने और उनके प्रशासनिक नियंत्रण हेतु दोनों के अपने अलग पावर होंगे ताकि दोनों समान रूप से सशक्त बनसकेँ l इस तरह उत्पाद शुल्क, सेवा, केंद्रीय बिक्री कर, वैट (मूल्य वर्धित कर), एंट्री टैक्स या चुंगी के रूप में कर सभी एक ही छतरी के नीचे जीएसटी द्वारा सम्मिलित किये जाएंगे l
जीएसटी विधेयक के प्रभाव और प्रासंगिकता 
वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार जीएसटी द्वारा 2 प्रतिशत की वृद्धि कर  भारत के सकल घरेलू उत्पाद की मदद करने में सहायक होगा। GST बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए अप्रत्यक्ष कर ढांचे कि जगह एकल कर की सुविधा प्रदान करेगा. राज्यों के वित्तीय अधिकार के नुकसान की आशंका पर GST विधेयक राजस्व हानि के किसी भी प्रकार के लिए तीन साल के लिए मुआवजा पैकेज देकर इस को हल करने का वादा किया है।  वित्त यूनियन एवं राज्य मंत्रियों को एक समान प्लेटफार्म देने के लिए GST परिषद का गठन होगा, जिस के अंतर्गत किसी भी तरह के वित्त राज्य एवं केंद्र के बीच उतपन्न होने वाले तनाव का निपटारा भी आसानी से हो सकेगा. जीएसटी में राज्य के लिए एक मुख्य तर्क-वितर्क में पेट्रोलियम उत्पादों का समावेश है। इस पर वर्तमान में आम सहमति से राज्यों के आयात और अंतर-राज्यीय व्यापार के अपवाद के साथ इन पर बिक्री कर (वैट) जारी रहेगा है।
            अतः  मोदी सरकार जीएसटी के कार्यान्वयन पर सहमति प्राप्त करते हुए इसे 1 अप्रैल 2016 से लागु करा मील का पत्थर तय कर सकती है.