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(साल 2015) खत्म होना तो एक शरुआत (नव वर्ष2016) है !

                कहना गलत नहीं होगा कि बीते वर्ष के शब्द पिछले साल की भाषा से जुड़े होते है, जबकि नए वर्ष के शब्दों को नई परिभाषा का इंतज़ार होता है. शायद इसी लिए नया साल शुभकामनाओं और उमीदों के साथ एक नया सफर आरम्भ करता है. लेकिन जितनी […]

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पंजाब हमला भारत के भरोसे पर ‘नापाक खंजर’, रिश्तों पर आघात नहीं तो क्या है ?

                    छह महीने में दूसरी बार बड़े आतंकी हमले को झेलने वाला पंजाब ,वहां के एक जिले के एसपी की गाड़ी एसपी सहित छीन ली जाती है. गाड़ी छीनने वाले कथित तौर पर सेना की वर्दी में होते हैं, वारदात अंजाम होने के कुछ घंटों बाद […]

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प्रधानमंत्री मोदी के उठते क़दम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शान से !

भारत को आज़ाद हुए ७ दशक पुरे होने को हैं, इन दशकों में आज तक भारत से सिर्फ ४ ही प्रधानमंत्री पाक गए, कांग्रेस से दो जवाहर लाल नेहरू (१९५३ एवं १९६०)और राजीव गांधी (१९८८ एवं १९८९) वहीँ भाजपा से भी दो अटल बिहारी बाजपेयी (१९९९ एवं २००४) और अब मोदी (२०१५)। जबकि कांग्रेस ने […]

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सीबीआई की साख पर राजनीतिकरण कितना विष कितना अमृत ?

                      ‘सीबीआई एक स्वतंत्र जाँच एजेंसी है ‘, भूत और वर्तमान की कई घटनायें इस तथ्य पर सवाल क्यों उठती हैं ? सीबीआई के प्रति ऐसी धारणा क्यों बनती जा रही हैं कि सीबीआई हमेशा केंद्र के सबसे बड़े लठैत की भूमिका ही निभाती आरही […]

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मानवाधिकार दिवस: मानवाधिकार के बहाने, जलाधिकार के मायने

  क्या गजब की बात है कि जिस-जिस पर खतरा मंडराया, हमने उस-उस के नाम पर दिवस घोषित कर दिए! मछली, गोरैया, पानी, मिट्टी, धरती, मां, पिता…यहां तक कि हाथ धोने और खोया-पाया के नाम पर भी दिवस मनाने का चलन चल पङा है। यह नया चलन है; संकट को याद करने का नया तरीका। […]

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फसल किसी ने लगाई, उजाड़ा किसी और ने, भुगतभोगी जनता बनी, आखिर क्यों ?

                             ऊपजाऊ खेतों से हट कर रास्ते से पहले की बंजर ज़मीन पर ज़मींदार साहब की नज़र तब भी नहीं पड़ती थी जब वह घोड़े पर सवार धुल उड़ाते प्रतिदिन अपने खेतों की सैर करते हैं। इस बात का इल्म होते ही […]

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सरकार पेट्रो से ही सही अच्छे दिनों के दर्शन करा दीजिए

             देश में बढ़ती महंगाई का कारण अगर रोज़मर्रा की चीज़ों की बढ़ती कीमतें हैं तो कीमतों के बढ़ने का कारण सीधे तौर पर पेट्रोलियम की बढ़ती कीमतें हैं । महंगाई के संकल्पना की तस्वीर यहीं तक साफ़ तसव्वुर है, लेकिन, ज्यों ही पेट्रोलियम की कीमतों की निर्भरता जानने की […]

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