TATA JAMSHEDPUR CURFEW 2015-” मत जलाओ मेरे शहर को ये अम्नो- अमाँ की निशानी है “

” मत जलाओ मेरे शहर को ये अम्नो- अमाँ की निशानी है ”

गुलाम भारत में मॉडर्न भारत का खाब जिस लीजेंड ने देखा , उसने भी कभी न सोचा होगा कि आगे चल कर ये खाब हक़ीक़त के पंख लगाए इस तेज़ी से तरक़्क़ी की राह पकड़ेगा . असल में मॉडर्न भारत से परिभाषित जिस शहर की बात हो रही है ये देश का पहला कॉस्मोपॉलिटन औद्योगिक शहर है जो आज उद्योग और पयर्यावरण के सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व का मॉडल है, हो भी क्यों नहीं शहर अपनी गोद में 183 स्कूल 13 महा विद्यालय और MGM , NIT , XLRI , SNTI , TFA जैसे विश्वस्तरी संस्थानों को धरोहर स्वरुप तो वही कीनन , JRD स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स द्वारा कहावत ‘ स्पोर्ट्स अरे अ वे ऑफ़ लाइफ ‘ को सिद्ध करते है.

ऐसे मॉडर्न भारत को जमशेदपुर का नाम 1919 में साकची के स्थान पर टाटा स्टील के संस्थापक जमशेद जी नौशेरवां जी टाटा की श्रद्धांजलि के रूप में लार्ड चेम्सफोर्ड ने दिए .

जी हा j n टाटा , ये वही लीजेंड है जिनका ज़िक्र आरम्भ में उनके खाबो के लिए मैंने किया . यही नहीं उनकी याद में आज भी 3rd मार्च को फाउंडर्स डे के रूप में मनायाजाता है जो इनका जन्म दिन था , जिस का प्रमाण 225 एकड़ में फैले जुबली पार्क की खूबसूरती में भी मिलता है,
लीजेंड जमशेदजी ने 19वि शताब्दी के अंत में भूगर्भ शास्त्री की मदद से देश के पहले स्टील प्लांट स्थापित करने का सपना संजोए लोहा कोयला, लाइमस्टोन और पानी से लैस दुर्लभ स्थान की तलाश मध्यप्रदेश से आरम्भ की. जो तीन साल के संघर्ष के बाद साकची नाम के गावं में पूरी हुई , जो आगे चलकर जमशेदपुर के रूप में पहचाना जाने लगा , TATA के विज़न और मिशन को ध्यान में रखते हुए शहर पुरे संतुलन के साथ वह चाहे कारखाने का कार्य छेत्र या फिर उसके लेबरो के आशियानों की बात , प्रगति के साथ आगे बढ़ता रहा.

1980 में बिहार राज्य सरकार के प्रस्तावित कानून ने टाटा के प्रशासन का अंत कर नगर पालिका का आधार रखा . लेकिन, शहर ने अपने हर दौर में में टाटा का अगर सुशासन देखा तो वही भिन्न त्रासदी की पीड़ा का शिकार भी बना,
असल में शहर की संरचना मज़दूरों की आवश्यकता पर निर्भर थी , इसी लिए शहर ने अनेको महापुरुषों की सेवाए देखीं, वह चाहे महान मज़दूर आंदोलनकारी कामरेड केदार दIस हो या फिर मज़दूरों का दुःख हरने वाले प्रोफ़ेसर अब्दुल बारी , या फिर टाटा मज़दूरों के सुख सुविधा के दिनों के गवाह मज़दूर नेता वि जी गोपाल, या फिर शिक्षा की क्रांति लआने वाले कबीर और करीम साहब जैसी सामाजिक हस्तिया ,.

इन सभी हस्तियों ने ही जिस अंदाज़ में शहर को खाबो के रंग में रमा , वह आज के शहरवासियों के लिए सुखद तोहफा है. शायद इसी लिए लौहनगरी भिन्न संस्कृति का संगम है, तो वही भिन्न धर्मो का मिलन भी, ये शहर गंगा जमुनी तहज़ीब का नगीना भी है , शायद इसी लिए सुख शांति का सागर भी है जमशेदपुर .

लेकिन ये अचानक रंग में भांग क्यू ? ऐसी आशांति की सड़के भी खामोश हो गई ? चहल पहल में ये कैसी नज़र लगी कि शहर बेचारगी से तड़प उठा , और इसके कुछ अपनों ने आह भी न की ???

बीती सोमवार तारिख २० जुलाई की रात जो कुछ भी यहाँ असामाजिकता के नाम पर घटित हुआ , वह अनगिनत सवाल खड़े करता है, खुद को इंसान कहलाने वाले सामाजिक लोग ज़ख्मो की टीस से कब तक शहर की खूबसूरती को दागदार करते रहेंगे ???
आज तक समाज की इस बदनुमा बिमारी का ज़िम्मेदार पकड़ा क्यू नहीं जासका ???
अतीत के स्याह पन्ने बार बार वर्तमान को अपनी कड़वी याद से ओत प्रोत क्यों कर रहे है ???
आखिर बार बार दो गुटो की झड़पों में सियासत की बू क्यों आती है ?
ये असामाजिक तत्व कैसे समझेंगे कि — “बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते है ,
किसी तितली को फूलो से न उड़ाया जाए ”

दिन सोमवार , समय रत ९:३० के करीब , शहर ने अपने सभ्य निवासियों की उग्रता तब देखी जब शहर के लोगो में मिलन के पर्व ईद की सिवइयों की मिठास भी फीकी नहीं पड़ी थी . खुद में बेचारगी महसूस कर रहा जमशेदपुर स्वं भी न समझ सका की आखिर इतनी उग्रता क्यू दिखाई दे रही है, हर तरफ तरह तरह की अफवाहे फैली थी , कही मानगो इस्थित गांधी मदन के मेले की बात तो कही लड़की के छेड़ छाड़ की बात, और ऐसे न जाने कितने किस्से शहर को कंफ्यूज कर रहे थे.

शहर में हमेशा सक्रिय रहने वाली पीस कमेटी ने भी तह तक जाना मुनासिब न समझा ??? तो वही प्रशासन का आरंभिक कदम भी तह तक न जाने के लिए असराहनीय रहा , और परिणाम का आभास शहर ने भी कर लिए , जब उसकी रगो यानि सड़क पर पथराओ शरू हुए. लेकिन इस लोह नगरी के आसुओ से खुद को बेखबर रखने वाले असामाजिक तत्वों पर शैतानियत ऐसी हावी हुई कि उन्हें रक्षक अर्थात प्रशासन भी नहीं दिखा जो उन पर भी हमले की कोशिश हुई .
इंसानियत शैतानियत की कैद में जा पहुंची , शहर भी तड़प उठा , अतीत की झड़पो के ज़ख्म फिर हरे हो गए , खौफ ने भी शहर को अपनी गिरफ्त में ऐसा किया कि क्या बच्चे क्या बड़े क्या बुज़ुर्ग इस मायूस घड़ी के शिकार होने लगे,ये हालत रात भर ज्यो के त्यों बने रहे, . प्रशासन ने भी धरा १४४ लगा स्थिति नियंत्रित करने की कोशिश की , लेकिन मंगलवार की सुबह बंद का ऐलान हुआ, सड़के जाम, मानगो ब्रिज जाम , शहरी अफरा तफरी के शिकार होने लगे, स्कूल में भच्चे जिन्हे असामाजिकता का अर्थ भी नहीं पता वह छुट्टी से पहले अभिभावकों के साथ निकल तो पड़े लेकिन बड़ी मुश्किल से घर पहुंचे, अब प्रशासन के आला अधिकारियो को भी आने वाले पल का आभास होने लगा , तारीफ़ करनी होगी मुख्यमंत्री रघुवर दस , डी आई जी , डी सी, S S P , s p की जिन्होंने वक़्त की नज़ाक़त को समझते हुए कर्फू का ऐलान किया ,

अब प्रश्न ये उठता है की इन हालातो से किसे क्या मिला ?
बात शहर की हो तो दुनिया जानती है, कि ये शहर औद्योगिक शहर है , जहा कुछ पल शहर रुक जाए तो समझिए दिन रुक गया , अर्थात कारोबार प्रभावित होगा, एक नज़र कारोबारी नुकसान पर,– रेलवे ने लगभग २० लाख का घटा उठाया, परिवहन ने २.4
करोड़ का नुकसान झेला , जमशेदपुर बाजार की बात हो तो २०० करोड़ जो आम जान जीवन से प्रभावित हुआ, उद्योग यानि कम्पनियो को 500 करोड़ का घटा झेलना पड़ा,

शिक्षा जगत ने भी दर्द झेल तो वही गरीब जिनकी झोपड़ी जली , ठेले जले , दुकाने जली , तो वही रोज़ कमा कर जीवन यापन करने वालो की आय रुकी , इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा ????

शहर के अधिकांश युवा जिन्हे इस कर्फु का अर्थ भी नहीं पता है उन्हें इस माहोल में हूटर की आवाज़, अर्ध सैनिक बालो की तैनाती , स्कूलों का बंद रहना , फ्लैग मार्च से सुरक्षा अहसास होना जैसी बातो ने जहा कोमल मन को ख़ौफ़ज़दा किया वही पसरी खामोशियो ने नाज़ुक हृदय पर कभिो न भूलने वाले ज़ख्मो सा घात किया , शायद इसी लिए शायर ने कहा है — ” ऐ दिले नादाँ कर्फु से न घबराना , बस घर में पड़े रहना न कही आना न कही जाना”,
लेकिन पुलिस प्रशासन की काबिले तारीफ कारकर्दगी ही है की असल मुजरिमो को फुर्ती से पकड़ा ही नहीं तह तक पहुँच शहर के हालत बिगड़ने के कारण से शहर को रु बरु किआ,

लेकिन शहरी ये ज़रूर कहते है कि जो लोग अखबारों में प्रति दिन छाए रहते है वह कहा थे , इस दौरान क्या अच्छा होता की थाना स्तर पर पहले ही दिन दोनों पक्छो के लोग एक साथ शांति मार्च निकलते , तो शायद 2500
करोड़ का कारोबार भी प्रभावित न होता,

लेकिन, न शहर रुक सकता है न शहरी, फिर भी समाज के बुद्धजीवियों को सामने आना होगा और संकल्प लेना होगा की अब ऐसा कभी नहीं होगा – तो क्या शायर ने ठीक कहा है— “अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाए “