UP विधान सभा चुनाव २०१७- साख की जंग हाथी और साइकिल में, पंजा वजूद तो कमल ठौर की तलाश में.

देश बखूबी वाकिफ है कि ५४३ लोकसभा सीटों की राजनीति में ४०३ विधान सभा सीटों का महत्त्व क्या है. जी हाँ ज़िक्र ४०३ विधान सभा सीटों से सजे उत्तरप्रदेश का का किया जारहा है, जिसका प्रभाव हमेशा हमेशा से ५४३ सीटों की मालिक केंद्र सरकार की राजनितिक स्थिरता हेतु उल्लेखनीय रहा है, शायद इसी लिए संसदीय चुनाव से पूर्व होने वाले UP विधान सभा चुनाव को सदा सेमीफाइनल स्वीकारा गया है.

31 मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल तो वहीँ 9 राष्ट्रपति शासन देख चुके उत्तर प्रदेश ने आज़ादी पश्चात कुल 16 विधान सभा चुनाव देखे हैं. ये आंकड़े उत्तरप्रदेश में राजनितिक अस्थिरता का परिचय ज़रूर देते हैं. असल में भारत के आज़ाद होते ही कांग्रेस केंद्र के साथ उत्तरप्रदेश में सत्ता पर काबिज़ हुई, ये सिलसिला पहले ,दूसरे और तीसरे विधान सभा तक ठीक चला. लेकिन चौथी विधान सभा के अंतिम दौर में ‘ भारतीय क्रांति दल ‘ ने चरण सिहं के नेतृत्व में कांग्रेस को झटका देते हुआ 328 दिनों तक सत्ता को अपने नाम कर लिया. लेकिन, पांचवी विधान सभा में कांग्रेस ने पहले झटके से उबरते हुए वापसी की, वहीं छठी विधान सभा में कांग्रेस किश्तों में अलग अलग मुख्यमंत्री देते हुए अस्थिरता के कारण ‘जनता पार्टी ‘ के पराक्रम के आगे नतमस्तक हो गई. इस प्रकार सातवीं विधान सभा जनता पार्टी के नाम रही. लेकिन जनता पार्टी नाम के इस तूफ़ान के शांत होते ही कांग्रेस ने एक बार फिर सत्ता में वापसी करते हुए आठवें, नौवें विधान सभा में सत्ता सुख प्राप्त किया.
लेकिन, अपनों में हुए असन्तोष के कारण खुद में हुए विद्रोह को न रोक सकी कांग्रेस को अगला झटका नई क्रांति यानी ‘ जनता दल ‘ से लगा, परिणामस्वरूप कांग्रेस सत्ता से ऐसी दूर हुई कि देश में कांग्रेस का अस्तित्व ज़िंदह रहने के बावजूद उत्तरप्रदेश में वापसी हो न सकी.

जब कि आठवीं विधानसभा अपने नाम कर चुकी जनता दल ऐसी बिखरी कि उसका अस्तित्व अब इतिहास के पन्नों में ही दीखता है. इस तरह 5 दिसम्बर १९८९ में कांग्रेस को जो वनवास आरम्भ हुआ वह आज तक बदस्तूर जरी है. लेकिन अपने वजूद की खातिर कांग्रेस 2017 विधान सभा चुनाव को अवसर मान एक बार फिर से संघर्षशील है.

देश की राजनीति में जिस दल ने कांग्रेस को सबसे कड़ी चुनौ रुक रुक कर मिली अस्थाई दूरी , कांग्रेस से सत्ता १९८९ से नियमित रूठी ती दी है वह ‘ जनता पार्टी ‘ है, भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा इसी जनता पार्टी की वंशज है. भाजपा ने अपने उदय के बाद 11वीं विधान सभा से अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, लेकिन जनता दल के बिखरने के बाद अस्तित्व में आईं क्षेत्रीय पार्टियों के प्रभावशाली क़द के कारण भाजपा आज भी उत्तरप्रदेश की सत्ता हेतु ठौर की तलाश में जद्दोजहद कर रही है.

लेकिन, बीते दो दशकों का इतिहास गवाह है कि उत्तरप्रदेश की चुनावी राजनीति में जब बात साख की आती है तो दो क्षेत्रीय दल बसपा और सपा में ही साख की जंग दिखाई देती रही है.

    रुक रुक कर मिली अस्थाई दूरी , कांग्रेस से सत्ता १९८९ से नियमित रूठी

मई 1952 में उत्तरप्रदेश की पहली विधान सभा हेतु चुनाव ४३१ सीटों पर हुए, 52.8 % मतदान के बाद कांग्रेस को ३८८ सीटें प्राप्त हुईं, तो मुख्यमंत्री बने गोविन्द वल्लभ पन्त. ये आंकड़े साफ़ साफ़ दर्शाते हैं कि आरम्भ में कांग्रेस को विपक्ष नाम की किसी चुनौटी से दो चार होना नहीं पड़ा. लेकिन, दुसरी विधानस सभा चुनाव परिणाम के अनुसार मत प्रतिशत तो घटे ही साथ ही कांग्रेस ने सत्ता ज़रूर बचाई. लेकिन, सीटें घट कर २८६ हो गईं, कारण विपक्ष ने पहली दस्तक दी, जिसमें ‘ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ‘ ने ४४ तो वहीँ निर्दलीयों ने ७४ सीटों की सेंद लगा कांग्रेस को आने वाले दिनों में कड़े इम्तेहान से गुजरने हेतु इशारे किये. इन इशारों का परिणाम ही था कि चौथी विधान सभा के अंतिम दौर में चरण सिंह मुख्यमंत्री बने और सत्ता स्थापित हुई नई नवेली ‘ भारतीय क्रांति दल ‘ के हाथों, जब कि कांग्रेस को विपक्ष में बैठने का पहला अनुभव मिला.जनता ने एक बार फिर कांग्रेस पर भरोसा दिखाया लेकिन सत्ता मिली १ साल के लिए, और भारतीय क्रांति दल चुनौती बन फिर से सत्ता पर काबिज़ हो गया. बतौर CM चरण सिंह का ये दूसरा दौर था जबकि भारतीय क्रांति दल के जनता पार्टी में विलय होते ही उन्हें देश का पांचवा प्रधानमंत्री बनने का गौरव मिला.कांग्रेस पांचवी विधान सभा में की सत्ता वापसी करते हुए जनवरी १९७६ तक उत्तरप्रदेश की बागडोर अपने हाथों में बनाये रखी.

लेकिन, अपनी स्थिरता को कायम रखने में नाकाम कांग्रेस जनता पार्टी के तूफ़ान के रूप में पेश आई चुनौती के आगे फिर एक बार नतमस्तक हो गई. यानी १९७७-८० के दूर में सातवीं विधान सभा के दौरान उत्तरप्रदेश की सत्ता पर काबिज़ रही जनता पार्टी ऐसी बिखरी कि आठवीं , नौंवी विधान सभा में सफल वापसी करती कांग्रेस को लगभग ९ वर्षों की सत्ता मिली. लेकिन १९८९ में जनता दल के उदय ने कांग्रेस को एक और झटका देते हुए सत्ता से बेदखल कर दिया. ये वही दौर था जब हाशिम पूरा की दर्दनाक घटना अंजाम हुई.

इधर दसवीं विधान सभा के १ वर्ष २०१ दिन पुरे करते ही जनता दल यु.पी. की सत्ता से ही नहीं देश के अन्य राज्यों में भिन्न क्षेत्रीय दलों में बिखर गई. जन्म ले चुकी जनता पार्टी की वारिस यानी ‘वंशज भारतीय जनता पार्टी ‘ को सत्ता मिली और कल्याण सिंह बने पार्टी के पहले मुख्यमंत्री. लेकिन ये दौर एक ऐसे काले इतिहास को दर्ज कर बैठा जिसकी छीटें कल्याण सरकार के अस्त का कारण बनीं. जी हाँ ६ दिसम्बर १९९२ का वह कला दिन, बाबरी मस्जिद पर हुआ हमला देश की राजनीति को विकास की पटरी से उतार धर्म की राजनीति पर ला खड़ा किया. देखते ही देखते पुरे देश में राष्ट्रीय पार्टी की जगह क्षेत्रीय दलों ने जहाँ दलित के नाम पर खुदकी रोटी सेंकने की राजनीति आरम्भ की तो वहीँ कुछ क्षेत्रीय पार्टियों ने यु.पी. में अल्पसंख्यकों को दंगों से सुरक्षा देने की राजनीति आरम्भ की. देखते ही देखते मुस्लिम शिक्षा, बेरोज़गारी को छोड़ सिर्फ दंगों से सुरक्षा के मद्दे नज़र वोट करने लगे. परिणामस्वरुप मुसिलम समाज की शिक्षा निम्नतम स्तर पर आ पहुंची जिसका प्रमाण सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मिलता है. दलित अल्पसंख्यक आधारित राजनीति आजतक बदस्तूर जारी है और कांग्रेस यू.पि. में होने वाले हर चुनाओ में अपनी खोई हुई ज़मीन हेतु वजूद की तलाश में लगातार संघर्षरत है.

 चुनावी परिस्थिति में कांग्रेस की स्थिति
यू.पी. ही नहीं संपूर्ण भारत में सत्ता का दूसरा नाम कॉंग्रेस हुआ करती थी , लेकिन एक अरसे से चली आरही मुख़ालफ़त के बावजूद आज भी कॉंग्रेस का जीता जागता वजूद जनता के दिलो दिमाग़ में ज़िंदा है, जो आज के कॉंग्रेसियों के लिए फख्र की बात है. लेकिन, बीते कल पर होने वाले फख्र में छिपा दर्द कॉंग्रेस की गिरती साख को उजागर करता है. फिर भी सालों साल से करारी शिकस्त की पीड़ा झेल रही कॉंग्रेस आज भी बाज़ीगर ही साबित होती रही है. २०१२ विधान सभा चुनाव हेतु ४०३ सीटों में सिर्फ़ २९ सीटें हासिल करते हुए २०१४ के 80 सीटों पर हुए संसदीय चुनाव में मात्र २ सीटों का जीतना या फिर असम और केरल की हार किसी बुरे सपने से कम नहीं, कांग्रेस इस दौर से बहार निकलने के लिए PK के नाम से मशहूर राजनीति प्रबंधक की सेवाएं ले रही है.
लेकिन, जिस जनाधार की ज़रूरत है, कांग्रेस उसे कितना प्राप्त कर पाएगी ये निर्भर होगा बसपा, सपा और भाजपा के वोट बैंक पर कांग्रेस की सेंद पर.

कॉंग्रेस का मज़बूत पक्ष.
आज़ादी पश्चात देश सिर्फ़ विकास चाहता था, कोई शक़ नहीं कि उस दौर में विकासशील भारत की रचना गढ़ने में कॉंग्रेस का सराहनीय योगदान रहा होगा, इसी लिए ख्यातिलबध कॉंग्रेसी नेताओं की भूमिका भी कहीं न कहीं आज भी जनता के दिलों में बस्ती है, इसी लिए आज भी कॉंग्रेस में सियासत और सत्ता के लिए वही जुनून है, परिणामस्वरूप कॉंग्रेस बार बार विकल्प बन कर उभरती रही है. फिलहाल राजनीति प्रबंधक PK के तजुर्बे से निकलती खुशबू और प्रियंका गांधी की रैलियां कांग्रेस को जनाधार कैश करा सकती हैं.
      कॉंग्रेस का कमज़ोर पक्ष.
कॉंग्रेस ने केंद्र में २००४ से २००९ के शासन में जो आकर्षण प्राप्त किया वह २००९ से २०१४ कार्यकाल में तार तार होता रहा. परिणामस्वरूप २०१४ में भाजपा ने कॉंग्रेस की राजनीतिक ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया. अब कॉंग्रेस को खोई हुई ज़मीन प्राप्त करने के लिए जहाँ चुनौती खोए वोटों के वापसी की है तो वहीं नए जनाधार को कॉंग्रेस से जोड़ने की ज़रूरत भी है. जनमत जुटाने के आज के तरीक़े पार्टी की नीति की आवश्यकताओं से जुड़ कर किस तरह बनारस जैसी उमड़ी भीड़ को कैश कर पाएगी ? याद कीजिये २०१४ संसदीय चुनाव की तैयारी के दौरान राहुल गाँधी ने भी खूब भीड़ खींची लेकिन उसे वोट में बदल पाने में कांग्रेस पूरी तरह नाकाम रही. असम केरल में मिली असफलता कहीं न कहीं मनोवैज्ञानिक चिंता ज़रूर देंगी, तो वहीँ मुस्लिम वोट का एक बार फिर सपा बसपा और कांग्रेस में बिखरना भी निर्णायक होसकता है.
२०१४ संसदीय चुनाव में भाजपा को मिले ४२.३०% वोट को कायम रखने की चुनौती

जी हाँ, भाजपा की पूर्वज, जनता पार्टी ने १९७७ में कॉंग्रेस युग पर पुरे देश में विराम लगाते हुए केंद्र ही नहीं उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाली. लेकिन, विडंबना ये रही कि ९६८ दिन UP की सत्ता पर काबिज़ रही तूफान की तरह आई जनता पार्टी देश से उसी फुर्ती के साथ विदा हो बैठी. ६ अप्रैल १९८० को जन्मी जनता पार्टी की वंशज भारतीय जनता पार्टी ने आँखें खोलीं, जिसे उत्तरप्रदेश में सत्ता सुख नसीब हुआ १९९१ में गवाह बने मुख्यमंत्री कल्याण सिंह. लेकिन, बाबरी मस्जिद पर हुए हमले के कारण भाजपा के हाथों से सत्ता गई. ३६३ दिनों का राष्ट्रपति शासन निभा चुके उत्तरप्रदेश में १२वि विधान सभा चुनाव के साथ राम मंदिर के मुद्दे के साथ भाजपा १७७ सीटों के साथ विधान सभा की सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन, सत्ता मिली पहले मुलायम सिंह को फिर सत्तासीन हुईं मायावती. समझ लीजिये यहीं से UP में क्षेत्रीय दलों बसपा और सपा के अस्तित्व का उदय हुआ.

तेरवीं विधान सभा गठन पर पहले १८४ दिनों का मायावती को सत्ता सुख मिला फिर १७४ सीटें हासिल होने के नाते भाजपा को दुसरी बार सत्ता मिली. लेकिन, १६२९ दिनों के कार्यकाल में पहले कल्याण सिंह, फिर राम प्रकाश गुप्ता और अंतिम मुख्यमंत्री राजनाथ सिह हुए. राजनाथ सिंह के कार्यकाल के बाद एक दशक से अधिक समय होने के बावजूद भाजपा की UP में वापसी हुई नहीं. और तो और भाजपा UP में बिलकुल हाशिये पर जा पहुँची. लेकिन, २०१४ में हुए संसदीय चुनाव हेतु मोदी लहर ने ८० में से ७१ सीटें अर्जित कर बसपा, सपा, और कांग्रेस को हाशिये पर ला खड़ा किया. यहीं से भाजपा खुद की वापसी हेतु भाजपा जहाँ ४२.३०% मतों को बचने की चुनौती के साथ संघर्षरत है वहीँ खोई हुई ज़मीन हेतु ठौर की तलाश में UP फ़तेह को बेताब है.

 चुनावी परिस्थिति में भाजपा की स्थिति.

अरसे की सियासी समझ का तजुर्बा, संघ की रणनीति में निखरती भाजपा ने पूरे देश में यदा कदा मिले मौकों से हुकूमत चलाने की क़ाबलियत से देश को अवगत किया. साथ भी बखूबी मिला कॉंग्रेस की खिसकती ज़मीन का. निखरती भाजपा का काफिला अपनी पताका फहराता २०१४ लोकसभा चुनाव में UP में मिले ४२.३०% वोटों के साथ मोदी युग की तारीख लिखते UP २०१७ चुनाव आ पहुँची. लेकिन १७वां
विधान सभा चुनाव चुनौतियों से भरा हुआ है.
अतः २०१७ चुनाव में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चनौती २०१४ लोकसभा चुनाव की सफलता को दोहराने की है. देश को इस बात का भी इल्म है की भाजपा की अबतक UP सफलता मुखालिफ़ मत विभाजन पर निर्भर करती आई है. इस लिए भाजपा मुखालिफ़ मत विभाजन की कामना इस बार फिर ज़रूर कर रही होगी.

    भाजपा का मज़बूत पक्ष.

एक ओर युवा मतदाताओं में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का जादू, दूसरी तरफ केंद्र में भाजपा की सरकार होना भाजपा का सबसे मज़बूत पक्ष है. विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा है, इसका लाभ राज्य के बूथ स्तर में संगठित कार्यकर्ता के नेटवर्क को मज़बूत करने के लिए टॉनिक से कम नही होगा.
कभी सोशल इंजीनियरिंग की शरुआत भाजपा के खिलाफ चुनाव जीतने के लिए सबसे सफल रणनीति थी. लेकिन, आज सोशल इंजीनियरिंग भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा है, तभी तो ब्राह्मण, राजपूत , ओबीसी और दलित को जोड़ कर भाजपा चुनावी माहौल को अपने बस में करने के जतन कर रही है.

  भाजपा का कमज़ोर पक्ष.

भाजपा ने दिल्ली से सबक़ लेते हुए बिहार में मोदी के चेहरे को सामने रख चुनावी बिगुल बजाया. लेकिन, बिहार की जनता जानती थी उसे बिहारी मुख्यमंत्री ही मिलेगा, मोदी नहीं. इस लिए UP में भी कोई चेहरा सामने न लाने पर मतदाताओं का एक वर्ग भ्रमित ज़रूर होगा भाजपा को वोट किस चेहरे को ध्यान में रख कर दें..
कमज़ोरी का एक अन्या पहलू भाजपा में कद्दावर नेताओं के रहते हुए दूसरे दलों से आ रहे नेताओं को तरजीह मिलती है तब भाजपा के सीनियर कार्यकर्त्ता किस तरह की भावना से वोटिंग हेतु सहयोग करेंगे. इन अवस्थाओं में भाजपा के कद्दावर नेताओं के संबंधियों को टिकट नहीं मिलता, तब दिखने वाले बागी तेवर भाजपा के बने बनाए समीकरण के बिगड़ने का मुख्य कारण हो सकते है. इसका प्रमाण विवेक श्रीवास्तव जोकि भाजपा किसान मोर्चा के उपाध्यक्ष हैं, उनके बंसल और माथुर के विरोध में उठे सुर से मिलता हैं.
देश में केंद्र सरकार के गठन पश्चात हुईं संप्रदायिक घटनाएं उसके बाद लगातार हुईं धार्मिक टिप्पणी, वह भी तब जब प्रधानमंत्री ने ऐसा न कहने के लिए मना किया. लगातार होती आरही ज़ुबानी जंग कहीं न कहीं वोटर को प्रभावित करेंगी.

१० वर्ष मिला सत्ता सुख, बावजूद इसके सपा लड़ रही साख की लड़ाई.

इन दस वर्षों में मुलायम सिंह के बतौर मुख्यमंत्री ५६६ दिनों के कार्यकाल का ज़िक्र किया नहीं गया. १९८९ में राजीव सरकार पर लगे बोफोर्स सकैंडल के इल्ज़ामों के बाद वी.पी.सिंह ने लेफ्ट और भाजपा की मदद से जनता दल को सत्ता दिला प्रधानमंत्री बने , वहीँ जनता दल के लिए मुलायम सिंह UP के मुख्यमंत्री बने. लेकिन, लालू प्रसाद यादव बिहार के समस्तीपुर में राम रथ यात्रा पर निकले आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया, परिणामस्वरुप भारतीय जनता पार्टी के समर्थन वापस लेने पर वी.पी. सिंह की सरकार अल्पमत के कारण गिर गई. देखते ही देखते जनता दल बिखरने लगी, और क्षेत्रीय दलों ने जन्म लेना आरम्भ किया. समाजवादी पार्टी उनमें से एक है.
सपा के अस्तित्व में आते ही १२वें विधान सभा चुनाव में १०९ सीटें प्राप्त कर up की दुसरी बड़ी पार्टी बन बसपा की ६७ सीटों का समर्थन लेते हुए राज्य में हिंदुत्व के बोलबाले के साथ उभर रही १७७ सीटों वाली भाजपा को सत्तासीन होने से रोक दिया, इस दौर के गवाह बने सपा मुख्यमंत्री मुलायम सिह, जिनका सत्ता रथ नए उत्तराखंड की मांग के दौर में तब रुका जब मायावती ने गेस्ट हाउस की घटना के बाद समर्थन वापस ले लिया और भाजपा के समर्थन से १३७ दिनों के लिए खुद सत्तासीन हो गईं.
१३वीं विधान सभा के गठन हेतु चुनाव फिर हुए और सपा ने ११० सीटों के साथ विपक्ष की ज़िम्मेदारी लेते हुए १४वीं विधान सभा में १४३ सीटें हासिल कर बसपा-भाजपा गठबंधन से बनी ४८३ दिनों तक चली माया सरकार के दौर में मुलायम सिह मुख्यमंत्री तब बने जब सपा ने बसपा के बागी विधायकों की मदद से १३५२ दिनों की सत्ता हासिल की. लेकिन, १५वीं विधान सभा में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार के ४ वर्ष ३०७ दिनों में मायावती के कार्य काल के दौरान सपा विपक्ष की भूमिका निभाती रही. लेकिन, २०१२ में हुए हुए चुनाव के बाद १६वीं विधान सभा में सपा की वापसी हुई, चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का मौका आया मुलायम सिंह के पास, लेकिन उन्होंने पुत्र अखिलेश को मुख्यमंत्री बना देश में युवा मुख्यमंत्री देने का अध्याय लिखा.
  चुनावी परिस्थिति में सपा की स्थिति.

आज की परिस्थितियों को देखा जाए तो सपा की असल लड़ाई खुद से है. वजह भी साफ़ है कि एक तरफ सपा को चुनौती उसे २०१२ में मिले वोट बचाने की है, जिस में अगर सेंद लगेगी तो कांग्रेस द्वारा, तो दुसरी तरफ बढ़ते पारिवारिक प्रभाव के कारण
सपा में कहीं अंदुरूनी खुशी तो कहीं अंदुरूनी गम कहावत ‘ हमें तो अपनों ने लुटा गैरों में कहाँ दम था, किश्ती वहाँ थी डूबी जहाँ पानी कम था ‘ को सिद्ध करने के लिए बेताब है. लड़ाई जहाँ राजग से है, वहीं तीसरा मोर्चा यानी मुस्लिम मोर्चा भी सामने खड़ा है, जो अपनों के तेवर से ही उपजा है.वह अलग बात है कि ऐसे मोर्चे पिछले वर्ष बिहार में मुंह की खा चुके हैं.
पिछले विधान सभा चुनाव में जनता का भरपूर प्यार प्राप्त करने वाले अखिलेश को सबसे बड़ी चुनौती इस प्यार को ताज़ा रखने की है. असल में अखिलेश ही तो हैं जिन्हों ने बिहार के लिए उमीदों का आसमान सजाया और ज़मीनी विकास के लिए जहाँ पंचायतों और शिक्षक नियोजन पहल की तो वहीं छात्रों के लिए लैपटॉप , साइकल योजना से दूरगामी नीतियों का संदेश दिया.

   सपा का कमज़ोर पक्ष.

अखिलेश की साफ सुथरी छवि एक तरफ ताक़त है तो दूसरी तरफ बीते कल से चली आ रही पूर्व दोस्त बसपा और सपा के साथ ताज़ा बैर भी, जो कम घातक नहीं. मुज़फ्फर नगर का कलंक सपा सरकार के इतिहास का सबसे बड़ा धब्बा है, पिछले चुनाव में मुलायम ने मुस्लिमों को रिझाने के लिए जो आरक्षण के वादे किये थे, यही नहीं अन्य मसले जैसे मुख़्तार अंसारी की पार्टी का सपा में विलय के लिए एलान फिर इंकार जैसे नजाने कितने मुद्दे हैं जो सपा की खुद की २०१२ की वोटों पर वार कर सकती है. शक़ नहीं UP में दलित वोटों की संख्या बहुत है, लेकिन, सपा आज तक यादव, मुस्लिम वोटों के अधिकार से आगे निकल दलितों को रिझा नहीं पायी, जो शायद सबसे निर्णायक आभाव यानी सपा के लिए सियासत और सत्ता का संघर्ष कठिन होनेवाला है. इस लिए स्थिति की दशा वोटों की दिशा तय करेंगी.

  सपा का मज़बूत पक्ष.

साफ़ सुथरी बेदाग़ छवि के मालिक अखिलेश के पिता शतरंज की सुलझी बिसात पर अनसुलझी चाल चलने में माहिर हैं. शायद इसी लिए सपा नेतृत्व अन्य पार्टियों की तुलना में सबसे सेफ कंधे यानी अखिलेश के हाथों में हैं. सच तो ये है कि अखिलेश के युवा और साफ़ छवी होने के कारण UP में एक उम्दा विकल्प हैं जो तजुर्बेकार माया और शीला दीक्षित के समान्तर खड़े हैं तो वहीँ भाजपा का बिना चेहरे के पेश होना अखिलेश के लिए सकारात्मक ही होगा. अगर चुनाव विकास की पिच से हटकर आरक्षण, जाती , धर्म की पिच पर होता है तब सियासी चाणक्य यानि नेता जी सबसे बड़े खिलाड़ी साबित होंगे.
     बार मुख्यमंत्री दे चुकी बसपा की साख है दाँव पर.

बी आर अम्बेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज आदि के विचारों से प्रेरित होने का दावा करती बहुजन समाज पार्टी की स्थापना बहुजन नायक काशी राम ने १९८४ में की. लेकिन, चुनाव जीतने का तोहफा जनता ने ११वीं विधान सभा में १२ सीटों की सौगात देकर बसपा को विधान सभा में उपस्थिति दर्ज करने का अवसर दिया. लेकिन, बसपा सत्ता की भागीदर १२वें विधान सभा चुनाव में ६७ सीटें प्राप्त कर up की दुसरी बड़ी पार्टी सपा को समर्थन देते हुए राज्य में हिंदुत्व के बोलबाले के साथ उभर रही १७७ सीटों वाली भाजपा को सत्तासीन होने से रोक दिया. बसपा ने गेस्ट हाउस की घटना के बाद सपा से समर्थन वापस लेते हुए भाजपा के समर्थन से १३७ दिनों के लिए सत्ता सम्भाली, और मायावती के सर पहली बार मुख्यमंत्री का ताज सजा .
१३वीं विधान सभा के गठन हेतु चुनाव फिर हुए और सपा ने ११० सीटों के साथ विपक्ष की ज़िम्मेदारी स्वीकारी, मायावती १८४ दिनों के लिए तो कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्ता और राज नाथ सिंह के कार्यकाल बतौर मुख्यमंत्री पुरे होने के बाद १४वीं विधान सभा के लिए बसपा-भाजपा गठबंधन से बनी ४८३ दिनों तक चली माया सरकार के दौर को विराम देकर में मुलायम सिह मुख्यमंत्री तब बने जब सपा ने बसपा के बागी विधायकों की मदद से १३५२ दिनों की सत्ता हासिल की. लेकिन, १५वीं विधान सभा में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार के ४ वर्ष ३०७ दिनों में मायावती के कार्य काल के दौरान सपा विपक्ष की भूमिका निभाती रही. ये मायावती का बतौर मुख्यमंत्री चौथा कार्यकाल था.
२०१२ में चुनाव परिणाम चौंकाने वाले रहे और बसपा २०६ से घट कर ८० सीटों पर सिमट गई. बसपा इस गम से अभी उबरी भी नहीं थी कि २०१४ लोकसभा चुनाव ने फिर एक बड़ा झटका देते हुए बसपा की लोकसभा में उपस्थिति को शून्य पर ला खड़ा किया. बसपा अपनी छवी से बखूबी वाकिफ हो चुकी थी, शायद इसी लिए १६वीं विधान सभा के कार्यकाल के दौरान UP में हुए उपचुनाव से बसपा ने खुद को अलग रखा.
     चुनावी परिस्थिति में बसपा की स्थिति.

मायावती के कद के असर का नतीजा है कि बसपा कहीं ना कहीं दल कम वन मैन शो अधिक है. जो यही नहीं, दलित मुद्दों की पिच बना उसपर पर बसपाइयों के ज़बानी शॉट
भाजपाइयों से दो दो हाथ करने की ललक ने राजनितिक पंडितों को बसपा वर्सेज़ भाजपा चुनाव देखने के लिए मजबूर कर दिया है. मायावती के लिए २०१४ लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी लहर में खिसक चुके दलित जनाधार की वापसी सबसे बड़ी चुनौती है. लगातार चल रहे भाजपा से शीत युद्ध में बसपा दलित वोट की वापसी तो करती दिख रही है, लेकिन सत्ता वापसी के लिए सिर्फ दलित वोट ही काफी नहीं.

बसपा का कमज़ोर पक्ष

बिहार में महागठबंधन की सफलता पर आवाज़ उठी कि बसपा सपा भी लालू नितीश की तरह मिल कर चुनाव लडें, लेकिन मायावती ने ऐसी सम्भावनाओं से इंकार कर दिया. यानी बसपा के अबतक के सफर की तरह मायावती अब भी अकेले चुनाव लड़ेंगी.
इस स्थिति में बसपा कई कोण से कमज़ोर प्रतीत होती है. मोदी के प्रति दलित वोटों का रुझान जो २०१४ में बना था, वह पूरी तरह समाप्त हो नहीं सकेगा. यानी बसपा की वोटों में भाजपा सेंद लगा चुकी है. डिजिटल इण्डिया का दौर जहाँ एक तरफ है वहीँ स्मार्ट मोबाइल की दुनिया दुसरी तरफ, यानी हर तरफ गाँव से शहर तक
हर पार्टी इसका लाभ उठा सोशल मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक जनता तक पहुँच बनाने हेतु ले रही है. जबकि इस दौर से दूर बसपा इस श्रृंखला में सबसे फिसड्डी साबित हो रही है. यानी आज भी बसपा २० साल पुराने तरीकों से चुनाव लड़ेगी. हर चुनाव में बसपा बगावत झेलती रही है जो आज भी बदस्तूर जारी है, जिससे उबरना सबसे मुश्किल कड़ी है.

    बसपा का मज़बूत पक्ष

मोदी युग की दस्तक के बावजूद बसपा को दलित वोटों का बड़ा जनाधार प्राप्त है. मुस्लिम वोटों का एक वर्ग आज भी मायावती में विशवास दिखाता है. मायावती के दौर के प्रशासन की मिसालें या उन्हें हर पल याद करने की जनता की अदा कहीं न कहीं जनता को बसपा से जोड़ती है.

 छुपा रुस्तम साबित होगा अपना दल.

४ नवम्बर १९९५ को अस्तित्व में आई अपना दल डॉक्टर सोनेलाल पटेल के सुशासन हेतु ख़ाब की ताबीर है. पहली बार २०१२ में पार्टी को सफलता तब मिली जब रोहनिया सीट से संस्थापक सोनेलाल पटेल की बड़ी बेटी अनुप्रिया पटेल MLA बनी, लेकिन २०१४ लोकसभा चुनाव में NDA का अंग बन चुकी ,अपना दल’ को दो सफलताएं मिर्ज़ापुर और प्रतापगढ़ की सीटों पर तब मिली जब अनुप्रिया पटेल जीत के बाद संसद पहुँच चुकी थीं. अपना दल फिलहाल बेटी अनुप्रिया पटेल और पत्नी कृष्णा पटेल के अंतर कलह की शिकार है. लेकिन, केंद्र में स्वस्थ, कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया सिंह पटेल की साफ़ सुथरी छवी, जनता के प्रति उनकी संसद में लगातार उठती आवाज़, संसद सत्र में शानदार उपस्थिति या फिर प्रश्नकाल के दौरान जनता की आवाज़ से संसद से रूबरू करने का अंदाज़ उन्हें आने वाले चुनाव में एक बड़ा चेहरा साबित करेगा . २ दशक से UP वासियों ने सपा और बसपा का कार्यकाल देखा है, अगर जनता बदलाव हेतु नज़र फेरती है तो समझ लीजिये अनुप्रिया सिंह पटेल के रूप में एक नया अध्याय UP की राजनीती में इंतज़ार कर रहा है.